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गैस का प्रमुख निर्यातक है. अगर पश्चिमी देश रूसी निर्यात पर बडे़ आर्थिक प्रतिबंध लगाते हैं, तो इससे ईंधन की कीमतों में भारी वृद्धि हो सकती है. विश्व बैंक के डाटाबेस के आंकड़ों के अनुसार, ईंधन आधारित वस्तुओं का रूसी निर्यात में 50 फीसदी से अधिक हिस्सा है. यूएस एनर्जी इंफॉर्मेशन एरूस दुनिया में कच्चे तेल/डमिनिस्ट्रेशन (यूएस-ईआईए) के आंकड़ों से पता चलता है कि रूस वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल उत्पादन का कम से कम दसवां हिस्सा तैयार करता है. जो मध्य पूर्व में पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक) में कुल कच्चे तेल उत्पादन का लगभग आधा है.
24 फरवरी को 2014 के बाद पहली बार कच्चे तेल की कीमतों ने 100 डॉलर प्रति बैरल की सीमा को पार किया है, जो रूसी कार्रवाई का सीधा नतीजा था. यूरोपीय देश गैस के लिए काफी हद तक रूस पर निर्भर हैं. ऐसी आशंकाएं हैं कि इसके नतीजे लंबे समय तक दिख सकते हैं. उदाहरण के लिए, जर्मनी ने रूस के नॉर्ड स्ट्रीम 2 गैस पाइपलाइन की मंजूरी पर रोक लगा दी है. अब रूस-यूक्रेन संकट के कारण ना केवल ईंधन की कीमतें बढ़ेंगी बल्कि इसका असर दूसरी कई चीजों पर भी पड़ेगा. रूस दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण गेहूं उत्पादक देशों में से एक भी है. जिससे खाने की चीजें भी महंगी हो जाएंगी.
विशेषज्ञों का मानना है कि महंगाई का झटका कोरोना महामारी के वजह से पहले से पटरी से उतरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है. ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट में कहा गया है, ‘2014 के बाद पहली बार तेल का दाम 100 डॉलर प्रति बैरल तक उछला है, जिसने वैश्विक अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका दिया है. अमेरिकी फेडरल रिजर्व और उसके साथी केंद्रीय बैंकों के लिए यह चिंताजनक बात है क्योंकि वे महामारी से उबरे बिना अब एक और संकट के सामने खडे़ हैं.
बिना किसी वैश्विक संकट के पहले से ही महंगाई एक बड़ा सिरदर्द बनी हुई है. विकसित देशों में अधिक आक्रामक मौद्रिक सख्ती भारत जैसे देशों में पूंजी और विदेशी मुद्रा बाजारों पर भी दबाव डालेगी. शेयर बाजारों पर इसका बेहद बुरा असर पड़ा है. भारत का बेंचमार्क स्टॉक मार्केट इंडेक्स, 24 फरवरी को 4.7 फीसदी गिर गया है.
भारत के पांच राज्यों में हो रहे चुनावों के बीच तेल की कमीतों को लेकर पहले से ही हल्ला मचा हुआ है. अब रूस-यूक्रेन संकट ने इस मुश्किल को और बढ़ा दिया है. पेट्रोल-डीजल की कीमतों को नवंबर 2021 से स्थिर रखा गया है, जब भारत के कच्चे तेल की कीमत 80 डॉलर प्रति बैरल थी. इस साल के आर्थिक सर्वेक्षण में अनुमान लगाया गया है कि अगले वित्त वर्ष में कच्चे तेल की कीमतें 70-75 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में बनी रहेंगी.
अगर कच्चे तेल की कीमतें मौजूदा स्तरों पर भी बनी रहती हैं, तो ईंधन की कीमतों में 10 रुपये प्रति लीटर से अधिक की वृद्धि करनी होगी, जब तक कि सरकार यूनियन एक्साइज ड्यूटी को कम करने या पेट्रोलियम सब्सिडी बढ़ाने के लिए तैयार नहीं होती है. इन दोनों फैसलों से बड़े पैमाने पर बजट में हुई गणना गड़बड़ा सकती है. कीमतों में भारी वृद्धि से महंगाई बढ़ेगी, आर्थिक संकट बढ़ेगा और राजनीतिक असंतोष बढ़ने की भी संभावना है. एक अकेली रोशनी की कीरण या कहें उम्मीद, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार है, जो लगभग 630 बिलियन डॉलर (जनवरी 2021 के आंकड़ों के अनुसार) है.