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पराधिक छवि वाले नेताओं के रिकॉर्ड का चुनाव में खुलासा करने के अपने आदेश की अवमानना पर सुप्रीम कोर्ट ने तीखी टिप्‍पणी की है। कोर्ट ने कहा- राजनीतिक व्‍यवस्‍था के अपराधिकरण का खतरा बढ़ता जा रहा है। इसकी शुद्धता के लिए आपराधिक पृष्‍ठभूमि वाले व्‍यक्तियों को कानून निर्माता बनने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए मगर हमारे हाथ बंधे हैं। हम सरकार के आरक्षित क्षेत्र में अतिक्रमण नहीं कर सकते। हम केवल कानून बनाने वालों की अंतरात्‍मा से अपील कर सकते हैं। वहीं एक अन्‍य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्‍यों को निर्देश जारी किया है कि सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले संबंधित हाईकोर्ट की अनुमति के बगैर वापस नहीं लिए जा सकते। राजनीति के अपराधीकरण पर जस्टिस रोहिंग्‍टन फली नरीमन और बीआर गवई की पीठ ने कहा कि उन्‍होंने समय-समय पर कानून निर्माताओं से अपील की कि वे इसके लिए संविधान में आवश्‍यक संशोधन लाएं। मगर इसका बहरे कानों पर असर नहीं हुआ। पार्टियां जीतने के लालच में गहरी नींद से जागने को तैयार ही नहीं हैं। हमें उम्‍मीद है कि वह समय आएगा। वे जल्‍द ही जागेंगे और इस कुप्रथा को खत्‍म करने के लिए बड़ी सर्जरी करेंगे। कोर्ट ने इसके लिए नए दिशा-निर्देश भी जारी किए। नए निर्देश :1 सभी पर्टियां आपराधिक छवि वाले नेताओं के रिकॉर्ड की जानकारी वेबसाइट के होम पेज पर डालें। यह जिस कॉलम में हो, उस पर साफ लिखा हो, ‘आपराधिक छवि वाले उम्‍मीदवार का ब्‍योरा। 2 चुनाव आयोग मोबाइल एप तैयार करे। इसमें सभी दलों के ऐसे नेताओं के रिकॉर्ड की विस्‍तृत जानकारी हो, ताकि लोग एक झटके में मोबाइल पर जानकारी ले सकें। 3 चुनाव आयोग लोगों के बीच जागरूकता अभियान भी चलाए। यह अभियान वेबसाइट तक सीमित होकर, मीडिया, टीवी विज्ञापनों, प्राइम टाइम डिबेट और पोस्‍टर आदि पर भी चले। 4 दल आदेशों का पालन करें, तो आयोग सूचना दे। कोर्ट सख्‍त कार्रवाई करेगा। 5 चुनाव आयोग अलग सेल बनाए, जिससे राजनीतिक दलों की निगरानी की जाए। कोर्ट ने कहा कि इससे मतदाताओं को प्रत्‍याशी की जानकारी मिल सकेगी।
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