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Vivek_Vishwakarma
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भारतीय संविधान में हिंदी को भारतीय संघ की राजकीय भाषा के रूप में स्वीकार किया गया है। इस संवैधानिक व्यवस्था को मूर्तरूप देने के लिए केेंद्रीय सरकार ने समय-समय पर नियम बनाए और आदेश जारी किए हैं। इनके फलस्वरूप सरकारी कामकाज में हिंदी के प्रयोग को क्रमशः बढ़ाया जा रहा है। पिछले चार दशकों में सरकारी क्षेत्र में हिंदी की प्रगति पर जब हम दृष्टि डालते हैं तो यही देखने को मिलता है कि प्रगति का क्रम धीमा है। उन क्षेत्रों में जहाँ कार्यालयों में हिंदी भाषी या हिंदी का कार्यसाधक ज्ञान रखने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों की संख्या पर्याप्त है, वहां भी, इसकी प्रगति जितनी होनी चाहिए उससे कहीं कम है। संवैधानिक व्यवस्था, आवश्यक मार्ग निर्देश, समुचित नियमों के बावजूद अगर प्रगति का क्रम अपेक्षा से कम है तो इसका कारण यही लगता है कि हिंदी में काम करने की योग्यता रखने वाले कर्मचारियों में अपेक्षित जागरूकता और उत्साह की कमी है। एक और तथ्य जो हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने में आड़े आता है, वह है बदलाव के प्रति उदासीनता। अंग्रेजी में काम करने की आदत को थोड़े प्रयास से बदला जा सकता है, लेकिन इसमें अभ्यास को बदलने की बात है इसलिए लोग टाल जाते हैं। वे यह नहीं सोचते कि इस प्रयास से वे न केवल अधिक कुशलता से अपना काम कर सकते हैं बल्कि अपने सहयोगियों को भी प्रोत्साहित कर सकते हैं और प्रशासनिक कार्य की कुशलता और गति भी बढ़ा सकते हैं।
एक जीवंत भाषा विकास और संवर्धन की निरंतर प्रक्रिया है। दैनिक प्रयोग से उसमें नये शब्द, नई अभिव्यक्तियों और नई शैलियों का समावेश होता है।