words per minute

16

Vivek_Vishwakarma


00:00

Speed

िसी समय कश्मीर में एक सम्मेलन हुआ था। उसमें भाषण करने वाले लोगों का बहुत बोलबाला था। भाषण करने वाले नेता होते हैं और सत्संग करने वाले संत होते हैं। जीभ तो वह की वही होती है। जब बुद्धि से, किताबों से और समाज के इधर-उधर के मतों से प्रभावित होकर बात कही जाती है तो वह भाषण हो जाता है, लेकिन संत बोलते हैं तो सत्संग हो जाता है। मीर तो टूटी-फूटी भाषा में ही हरिगीत गाती थी। उसे बहुत सुंदर सुहावने ढंग से लता मंगेशकर गाती होगी। उसके कोकिलकंठ से निकली हुई मधुर एवं सुरीली आवाज के जादू से लोगों को मनोरंजन मिलता है, किंतु मन की शांति नहीं मिलती। मीरा उससे भले ही कम सुरीले कंठवाली होगी, तो भी मीरा के श्रीमुख से जिन्होंने हरिगीत सुना होगा, उनके मन को शआंति अवश्य मिली होगी। प्रोफेसर भले ही सुंदर ढंग से बोले, किंतु उसके वचन व्याख्यान हो जाते हैं जबकि कबीर जी भले ही टूटी-फूटी भाषा शैली में बोलें फिर भी उनके वचन सत्संग बन जाते हैं। कश्मीर के उस सम्मेलन में एक वक्ता ने कहा - जब तक दिल पवित्र नहीं हुआ तब तक राम-राम कहने से क्या फायदा। पहले मन को पवित्र करो, फिर राम-राम कहो। इस प्रकार का भआषण देकर वह बैठ गया। फिर किसी संत की बारी आई। संत बोले - अभी-अभी एक सज्जन भाषण करके गए। उनका गंतव्य है कि जब तक मन पवित्र नहीं हुआ तब तक राम-राम करने से क्या फायदा। पहले मन को पवित्र करो फिर राम-राम जपो। यदि हृदय सूखा है तो भी राम-नाम लो जिससे सूखापन मिटते ही राम-नाम के रस का अनुभव हो जाएगा।
words per minute
0
wpm
accuracy
0%
Text Practice - Time 489 - English

words per minute