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वर्तमान आवेदन भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के अधीन फाइल किया गया है। मामला कुटुंब न्यायालय अधिनियम, 1984 के अधीन स्थापित कुटुंब न्यायालय से संबंधित है। आवेदक ने हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के अधीन इस आधार पर विवाह विच्छेद के लिए आवेदन फाइल किया था कि प्रत्यर्थी/पत्नी उसके साथ क्रूरता बरतती है। उसके तरुण जिसका पता इस रिट याचिका के पैरा में दिया गया है, नामक व्यक्ति के साथ अवैध संबंध हैं। इस आवेदन के लंबन के दौरान प्रत्यर्थी/पत्नी ने हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 24 के अधीन एक आवेदन फाइल किया जिसमें उसने कार्यवाहियों के लंबन के दौरान उसे भरण पोषण और खर्चों का संदाय करने का आदेश करने के लिए अनुरोध किया। कुटुंब न्यायालय द्वारा आदेश में उल्लिखित धनराशि के संदाय का निदेश करते हुए आक्षेपित आदेश पारित किया गया था। निचले न्यायालय ने यह भी निदेश दिया कि उपर्युक्त तरुण को कार्यवाहियों में प्रत्यर्थी के रूप में पक्षकार बनाया जाए। वर्तमान मामले में इसी आदेश को आक्षेपित किया गया है। हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 14 और 21 में उच्च न्यायालय को नियम बनाने की शक्ति प्रदत्त की गई है। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने हिन्दू विवाह अधिनियम के अधीन कार्यवाहियों को विनियमित करने के लिए नियम विरचित किए हैं। हिन्दू विवाह अधिनियम के अधीन नियमों के समूह में उच्च न्यायालय मध्यप्रदेश नियम, 2007 का नियम 366 भी सम्मिलित है। इन नियमों के उप नियम का खंड 5 अन्य बातों के साथ साथ यह उपबंध करता है कि यदि विवाह विच्छेद के लिए अर्जी जारकर्म के आधार पर फाइल की गई है तो ऐसे सभी व्यक्तियों के जिन्होंने ऐसे कार्य किए हैं, नाम और पतों का अर्जी में उल्लेख किया जाना चाहिए। अत: लागू कानूनी नियम स्वत: अभिकथित जारकर्मकर्ता को हिन्दू विवाह अधिनियम के अधीन विवाह विच्छेद की कार्यवाहियों में और मध्यप्रदेश राज्य के किसी न्यायालय में कार्यवाही में सहप्रत्यर्थी के रूप में पक्षकार बनाने के लिए उपबंध करते हैं। यदि विवाह विच्छेद अधिनियम, 1869 के उपबंधों का परिशीलन किया जाए तो अधिनियम की धारा 11 विशेष रूप से यह उपबंध करती है कि जारकर्मकर्ता को या जारकर्म में रहने वाली स्त्री को सहप्रत्यर्थी बनाया जाएगा जब तक कि आवेदक न्यायालय को ऐसा न करने के बारे में कोई समुचित कारण न बताए और उन परिस्थितियों से अवगत न कराए जिनका इस धारा में उल्लेख किया गया है। तथापि, हिन्दू विवाह अधिनियम इस बात के लिए आबद्धकारी नहीं बनाता कि जारकर्म के आधार पर अभिकथित जारकर्मकर्ता को पक्षकार बनाया जाए। निचला न्यायालय कुटुंब न्यायालय है।