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वर्तमान मामले के संदर्भ में तथ्यों का उल्लेख करते हुए, न्यायालय में पत्नी द्वारा फाइल दाण्डिक मामला न्यायोचित नहीं है जिससे यह तथ्य साबित होता हो कि उसने वस्तुत: अपने अधिकार को सिद्ध किया है। अभिलेख पर ऐसी कोई सामग्री नहीं है जिससे कि पति या उसके कुटुम्ब सदस्यों द्वारा दहेज की मांग को किसी तरीके से साबित करती है। नि:संदेह, जैसा कि स्पष्ट किया गया है, मात्र यह मामला संस्थित करने से ही अपने आप में निर्दयता सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं होता है। मैं निर्णय में ऐसा कोई अर्थ निकालने में असमर्थ हूं जो अभिलेख से प्रकट होता हो। यह आधार अपने आप में ही अधिनियम के अंतर्गत निर्दयता गठित करने के लिए पर्याप्त है जो विवाद विच्छेद की डिक्री मंजूर करने के लिए आधार गठित करती है। दूसरी ओर अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता ने यह निवेदन किया है कि अभिलेख पर कोई अभित्याग साबित नहीं किया गया है। न्यायालय स्वयमेव ही यह अभिनिर्धारित नहीं कर सकता है कि साक्ष्यों से ऐसा निष्कर्ष निकाला जा सकता है। अभिलेख पर यह सिद्ध होता है कि पत्नी ने अपनी उस पुत्री की देखाभाल नहीं की जो दमा से ग्रसित थी। ऐसी माता के बारे में क्या कहा जा सकता है जिसने अपने बच्चे को ऐसी अवस्था में त्याग दिया था तब जबकि वह बीमारी से ग्रसित थी। इस न्यायालय के समक्ष यह तर्क देने की इच्छा की गई थी कि वह अपनी बच्ची की अभिरक्षा इस कारण से नहीं ले सकती थी कि उसके पास पर्याप्त धन नहीं था, इसे अभिलेख पर न तो अभ्याविदित किया गया अथवा साबित किया गया न ही सिद्ध किया गया है। न्यायालय अभिलेख पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं पाता है जिससे कि माता द्वारा अपनी अवयस्क बालिका का संरक्षण नहीं लेने को न्यायोचित पा सकता है जिसकी पिता और माता दोनों द्वारा युक्तियुक्त रूप से देखभाल करनी चाहिए और करनी चाहिए थी। न्यायालय द्वारा विचारित अन्य साक्ष्य से यह उपदर्शित होता है कि अभिलेख पर लाये गये समझौते से एक चीज यह साबित होती है कि तथाकथित प्रत्येक समझौते के पश्चात अपीलार्थी वापस आ जाती थी जहां पुन: अन्य समझौता किया गया था, दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि तथाकथित समझौते पर कार्य करने का कोई आशय नहीं होता था अपितु मात्र यह साक्ष्य या सामग्री सृजित करने का आशय होता था जिससे कि यह दर्शित हो सके कि समझौते के अनुसार और समझौते की भावना के अनुसार कारित किया गया।