words per minute
16
shahidman009238
00:00
Speed
उक्त मामले में अनुपस्थित आरोपीगण की ओर से उनके अधिवक्ता द्वारा एक आवेदन अंतर्गत धारा 317 दण्ड प्रक्रिया संहिता प्रस्तुत किया गया, जो बाद विचार स्वीकृत किया जाता है। प्रकरण आज मूल अभिलेख हेतु नियत है। मूल अभिलेख पूर्व में न्यायालय को प्राप्त हो चुका है। अभिलेख के साथ माननीय प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश का आदेश दिनांक 4 मार्च 2016 अभिलेख के साथ हुआ। उक्त आदेश में माननीय अपर सत्र न्यायालय द्वारा आदेशित किया गया है कि आरोपीगण के विरूद्ध भारतीय दण्ड विधान की धारा 294 एवं 451 के अंतर्गत आरोप बनना प्रकट होता है। उक्त आदेश में इस न्यायालय द्वारा विरचित किए गए आरोप अंतर्गत धारा 452 भारतीय दंड विधान अपास्त किया गया है तथा न्यायालय को पुन: आरोप विरचित करने बावत आदेशित किया गया है। अत: उक्त आदेश के पालन में पुन: उभयपक्ष के आरोप पर तर्क सुने गए। अभियोग पत्र एवं संलग्न दस्तावेजों का अवलोकन किया गया। अवलोकन उपरांत पाया गया कि आरोपीगण के विरूद्ध भारतीय दण्ड विधान के अनुसार और उसकी धारा के अंतर्गत अपराध बनना प्रतीत होता है। तद्नुसार उपस्थित आरोपी एवं अनुपस्थित आरोपीगण की ओर से उनके अधिवक्ता को अपराध लगाकर सुनाये व समझाए गए तो उपस्थित आरोपी एवं अनुपस्थित आरोपीगण की ओर से उनके अधिवक्ता द्वारा उक्त अपराध किया जाना अस्वीकार किया तथा विचारण चाहा। उनकी सूची नियमानुसार लेखबद्ध की गई। आरोपीगण से धारा 294 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत अभियोजन दस्तावेजों की स्वीकृति एवं इंकार के बारे में पूछे जाने पर उनके द्वारा सभी दस्तावेजों को अस्वीकार किया गया। दिनांक 28 जनवरी 2016 की अनुपस्थिति के संबंध में आवेदक के मौखिक कथन की पुष्टि दस्तावेजों या अन्य स्वतंत्र साक्षियों के कथन से नहीं कराई जा सकी है, किंतु आवेदक की ओर से आवेदन पत्र 28 जनवरी 2016 के पांच दिन पश्चात दिनांक 3 फरवरी 2016 को निर्धारित समयावधि के अंतर्गत प्रस्तुत किया गया है। नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत अनुसार पक्षकारों के मध्य विवाद का निराकरण उभयपक्ष की साक्ष्य उपरांत गुण-दोषों के आधार पर किया जाना चाहिए। आवेदक निर्धारित समयावधि में उपस्थित हुआ है तथा आवेदन पत्र सद्भावित होना प्रकट हो रहा है, किंतु आवेदक की अनुपस्थिति के कारण मूल व्यवहारवाद में विलंब हुआ है।