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sachin1991


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ाचियों ने तारीख 21 दिसंबर, 1990 को 1991 की अंतरण याचिका संख्‍या 40 फाइल की और उच्‍चतम न्‍यायालय ने अगले आदेशों तक इस न्‍यायालय की कार्यवाहियों को रोक दिया। इस और कई उच्‍च न्‍यायालयों के समक्ष लंबित अन्‍य समान याचिकाओं में संविधान की दसवीं अनुसूची के अधीन अध्‍यक्ष द्वारा पारित आदेश का पुनर्विलोकन करने के लिए न्‍यायालयों की अधिकारिता को समाप्‍त करने की संवैधानिकता, न्‍यायिक पुनर्विलोकन की उपलभ्‍यता और अन्‍य प्रश्‍नों पर विचार किया गया था और उच्‍चतम न्‍यायालय ने संवैधानिक न्‍यायपीठ की मार्फत तारीख 12 नवंबर, 1991 के आदेश द्वारा विधि अधिकथित की। उच्‍चतम न्‍यायालय ने यह भी मत व्‍यक्‍त किया कि उच्‍च न्‍यायालय द्वारा रिट याचिका में उठाए गए तथ्‍य संबंधी संविवादों का इस प्रकार अधिकथित विधि को लागू करके विनिश्‍चय किया जाना चाहिए और रिट याचिका निपटारे के लिए इस उच्‍च न्‍यायालय को प्रतिप्रेषित की है। इस न्‍यायालय ने तारीख 9 दिसंबर, 1991 के आदेश द्वारा याचियों को निरर्हित करने वाले प्रथम प्रत्‍यर्थी के आदेश को और विधानसभा के दस अन्‍य सदस्‍यों को निरर्हित करने वाले तारीख 16 दिसंबर, 1990 के अन्‍य आदेश को रोक दिया। इस आदेश को 1991 की अपील करने की विशेष याचिका संख्‍या 18928 और संबद्ध अपील करने की विशेष इजाजत याचिकाओं में उच्‍चतम न्‍यायालय के समक्ष चुनौती दी गई है। उच्‍चतम न्‍यायालय ने अपील करने की विशेष इजाजत याचिकाओं को तारीख 17 जनवरी 1992 तक के लिए इस आशय से स्‍थगित कर दिया कि उच्‍च न्‍यायालय में लंबित रिट याचिकाओं का शीघ्र निपटारा कर दिया जाएगा और पक्षकारों को तारीख 17 दिसंबर, 1991 को उच्‍च न्‍यायालय के समक्ष उपस्थित होने के लिए निदेश दिया ताकि न्‍यायालय सुनवाई की तारीख नियत कर सके। उस दिन सुनवाई की तारीख नियत की गई थी और मामले की तब से सुनवाई हो रही है। उपरोक्‍त चर्चा के आधार पर मेरी यह राय है कि यह उचित मामला है जिसमें दण्‍ड प्रक्रिया संहिता 482 के अधीन अधिकारिता का प्रयोग करते हुए आगे की कार्यवाही अभिखण्डित की जानी चाहिए। आवेदक के विरूद्ध अभिकथित अपराध समनीय मामले के रूप में विचारणीय है। यह अभिकथन किया गया है कि आवेदक के मकान पर तारीख 21 फरवरी, 1997 को छापा मारा गया है।
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