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अभियोजन की ओर से अपने तर्क में व्यक्त किया गया कि अभिलेख पर प्रस्तुत दस्तावेजी व मौखिक साक्ष्य के माध्यम से अभियोजन ने यह प्रमाणित किया है कि अभियुक्त वह व्यक्ति है जिसने पीडि़त रतन को ऋण दिलाने का असत्य आश्वासन देकर प्रतिरूपण द्वारा छल करके उक्त पीडि़त से 80 हजार रुपए बेईमानी तथा कपटपूर्वक प्रवंचना कर छल से प्राप्त की है। अत: अभियुक्त को कठोर से कठोर दंड से दंडित किए जाने की प्रार्थना की है। खंडन में अभियुक्त की ओर से प्रार्थना की गई है कि प्रकरण में जिस प्रकार की व जिस स्तर की विवेचना की गई है उसके आलोक में अभियुक्त को अभिकथित अपराध से जोड़े जाने हेतु कोई साक्ष्य अभिलेख पर नहीं है। तर्कों में व्यक्त किया गया कि आक्षेपों के परिप्रेक्ष्य में अभिलेख पर स्पष्ट रूप से आवश्यक दस्तावेजी साक्ष्य का अभाव है एवं परियोजन अपने मामले को अभियुक्त के विरुद्ध प्रमाणित नहीं कर सका है। अत: अभियुक्त को दोषमुक्त किये जाने की प्रार्थना की है। अभियुक्त पर फरियादी प्रतिका एवं पीडि़त कांता व श्वेता के साथ भी छल करने के छल से धारा 420 भारतीय दंड संहिता एवं इन्हीं के साथ प्रतिरूपण द्वारा छल करने के आधार पर धारा 419 भारतीय दंड संहिता के अपराध का आरोप विरचित किया गया था, जो फरियादी प्रतीका, पीडि़त कांता व श्वेता द्वारा स्वेच्छा समझौता करने के परिणामस्वरूप आदेश पत्रिका अनुसार अभियुक्त को उक्त फरियादी प्रतीका एवं पीडि़त कांता व श्वेता की सीमा तक विरचित आरोप शीर्ष अंतर्गत धारा 419 एवं 420 भारतीय दंड संहिता से दोषमुक्त किया गया है। इसलिए फरियादी प्रतीका एवं पीडि़त कांता व श्वेता के साथ किए गए छल अथवा प्रतिरूपण द्वारा छल को निष्कर्षित नहीं किया जाना है। इसलिए उक्त साक्षीगण के कथनों को अभिकथित प्रतिरूपण द्वारा छल अथवा छल के आरोप के संबंध में विचार में नहीं लिया जा रहा है। अभियुक्त पर अन्य धाराओं के साथ-साथ आहत रतन के संबंध में धारा 420 भारतीय दंड संहिता के अपराध का भी अभियोग है। इस धारा के अपराध को प्रमाणित करने के लिए अभियोजन को सर्वप्रथम यह संघटक प्रमाणित करना आवश्यक है कि अभियुक्त द्वारा किसी व्यक्ति को कोई संपत्ति परिदत्त करने के लिए कपटपूर्वक या बेईमानी से उक्त व्यक्ति को प्रवंचना पूर्वक उत्प्रेरित करना आवश्यक है। इसलिए प्रकरण में सर्वप्रथम यह विचार किया जाना आवश्यक है कि अभियुक्त द्वारा पीडि़त व्यक्ति को कपटपूर्वक अथवा बेईमानी से किसी संपत्ति को परिदत्त करने के लिए प्रवंचना पूर्वक उत्प्रेरित किया गया था। अभियोजन कथानक अनुसार अभियुक्त ने स्वयं का नाम विवेक सक्सेना बताते हुए समाचार पत्र में बिना गारंटर लोन दिलाने का विज्ञापन दिया था जिसमें एक-एक मोबाईल नंबर लेख था जिसपर पीडि़त रतन द्वारा संपर्क करने पर अभियुक्त द्वारा सभी प्रकार के ऋण स्वीकृत करा देना। पीडि़त रतन को बताया था।