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lakhan123
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अल – कायदा का सरगना जवाहिरी अपने उस्ताद ओसामा की तरह मारा गया । औसामा को मारा गया था पाकिस्तान में और जवाहिरी को मारा गया अफगानिस्तान में औसामा सऊदी अरब का था और जवाहीरी मिस्र का ये दोनों अपना देश छोड़कर वहां जा बसे थे और उन्हें आतंकवाद का अड्डा बना दिया था । लेकिन अब अल कायदा का क्या होगा और इस घटना का असर अफगानिस्तान पाकिस्तान और भारत पर क्या होगा जहां तक अल कायदा का प्रशन हैं , अभी तो जवाहिरी के उत्तराधिकारी की खोज होगी । अल कायदा अब वैसा नहीं रहा जैसा ओसाम के जमाने में था । वह निरंतर कमजोर होता गया है । सके कई टुकडों ने अपने अपने संगठन खड़े कर लिए है । इस्लामिक स्टेट आँफ खुरासान प्रोविंस नामक आतंकी संगठठन अब पश्चिम और दक्षिण एशिया के दोशों में पांव पसार रहा है । जवाहिरी की जगह लेने के लिए तीन चार नाम उभर तो रहे हैं लेकिन उन्हें पता है स वक्त अफगानिस्तान व पाकिस्तान की हालत इतनी खस्ता है कि वे पहले की तरह अल कायदा , इस्लामिक स्टेट , अंसार अल इस्लाम और दक्षिण एशियाई अल कायदा जैसे संगठोनो की मदद नहीं कर सकते लेकिन अफगानिस्तान की तालिबान सरकार की मदद के बिना क्या काबुल के शेरपूर नामक शानदार इलाके में जवाहिरी रह सकता था । जिस फ्लेट में वह रह रहा था , वह भी किसी तालिबानी नेता के रिश्तेदार का बताया जाता है । एक तरफ तो तालिबान आतंकवाद के विरोध की बात करते हैं , दूसरी तरफ जवाहिरी जैसे पता नहीं कितने आतंकवादियों को काबूल , कंधार और जलालाबाद में प्रश्रय दिए हुए हैं । अमेरिकी सरकार ने तालिबान सरकार पर 2020 के दोहा समझोते के उल्लंघन का आरोपी लगाया है उसमें तालिबान ने वायदा किया था कि वे आतंकवाद को अफगान भूमि पर कतई नहीं पनपने देंगे । इस मसले पर अपना मुंह छिपाने या दुम दबाने के बजाय तालिबान सरकार ने अमेरिका की निंदा की है । जो देश संकटग्रस्त अफगान जनता की मदद करना चाह रहे थे , वे भी अब इस घटना के कारण जरा दुबकेंगे । हालांकि चीन ने अमेरिका को अफगानिस्तान की संप्रभुता भंग करने का दोषी ठहाराया है । उसका मूल कारण प्रशांत और पश्चिम एशिया क्षेत्र में अमेरिका की चीन विरोधी गठबंधन खड़े करने की नीति है इसके अलावा चीन चाहता है कि अफगानिस्तान के खनिज पदार्थों की खदानों पर सका एकाधिकार हो जाए ।