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Ghulam_Mustafa
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दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 सहपठित परक्राम्य लिखित अधिनियम, के अधीन अंतर्निहित अधिकारिता का प्रयोग तब तक नहीं करना चाहिए, जब तक किसी विनिर्दिष्ट उपबंध के सहारे पक्षकारों को प्रभावी पुनरीक्षण की सुविधा प्राप्त हो। आवेदिकाएं अपने पतियों सहित एक फर्म की भागीदार थीं। उस फर्म को प्रत्यर्थी फर्म के लिए धन का संदाय करना था, जिसके लिए दिए गए चेक दो बार अनादृत हो गए। अनादृत होने की विहित सूचना दी गई और संदाय के लिए 15 दिन का समय दिया गया। संदाय में विफलता के परिणामस्वरूप मजिस्ट्रेट के समक्ष परक्राम्य लिखित अधिनियम की धारा 141 के साथ पठित धारा 138 के अधीन अपराध के लिए परिवाद किया गया। मजिस्ट्रेट ने यह आदेश किया कि आवेदकों और अन्य व्यक्तियों के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद थे। इस आदेश के विरुद्ध आवेदकों ने सेशन न्यायाधीश के समक्ष पुनरीक्षण फाइल किया, जिन्होंने यह निष्कर्ष दिया कि इस मामले में समन जारी करते हुए किया गया आदेश अंतर्वती आदेश था और इसलिए संहिता की धारा 397(2) के वर्जन को ध्यान में रखते हुए पुनरीक्षण संधार्य नहीं था। अभियुक्त आवेदिकाओं ने दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के अधीन कार्यवाही अभिखण्डित करने के लिए आवेदन किया। उच्च न्यायालय का निष्कर्ष था कि आवेदिकाएं एक फर्म के भागीदार के रूप में आभ्यासिक रूप मे कार्य कर रही थीं। और उनके पतियों को, जो उसी फर्म के भागीदार थे, सूचना स्वीकृतत: मिली थी, अत: ऐसी सूचना विधि की दृष्टि में आवेदिकाओं को भी सूचना मानी जाएगी, विशेषत: भागीदारी अधिनियम की धारा 24 की दृष्टि से। अत: विचारार्थ प्रश्न यह उठा कि क्या दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के अधीन अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए मजिस्ट्रेट के समक्ष कार्यवाही अभिखण्डित की जानी चाहिए। आवेदन खारिज करते हुए, सर्वप्रथम इस न्यायालय में धारा 482 के अधीन अंतर्निहित अधिकारिता का प्रयोग तब तक नहीं करना चाहिए, जब तक किसी विनिर्दिष्ट उपबंध के सहारे पक्षकारों को पुनरीक्षण की सुविधा उपलब्ध है। फिर यदि ऐसी शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है तो वह प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करेगा और अंतत: आवेदन पर धारा 482 का लेबल लगाने मात्र से न्यायालय की नजर से आवेदन का सही अर्थ या लेबल बच नहीं जाएगा।