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lakhan123
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ताईवान से भारत के गहरे हित जुड़े हैं । इसका सबसे प्रमुख कारण यह है कि ताईवान और भारत चीन की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं की राह में अडंगे की तरह हैं । चीन हम दोनों को अपने एक ऐसे काम की तरह देखता है, जिसे निबटाया नहीं जा सका है । अगर दोनों में से कोई एककमजोर पड़ता है तो चीन अपनी आक्रामकता का पूरा रूख दूसरे की ओर मोड़ देगा । एक की सुरक्षा दूसरे पर निर्भर है । इसके बावजूद भारत ताईवान से संवाद करने में संकोच करता है । हमारी फोज इसबात को बहुत अच्छी तरह समझती है कि चीन दुश्मन है और वह उसके लिए खुद को तैयार रखती है । वह यह भी चाहती है कि हम ताईवानियों से सैन्य और खुफिया सहभागिता कायम करें। लेकिन हमारा विदेश मंत्रालय भारत की सुरक्षा निति को विटो कर देता है । कभी कभी हम चीन के पक्ष को इतनी बेपरवाही से स्वीकार कर लेते हैं कि अनेक चीनी वार्ताकारों ने मुझसे कहा है कि हम चीन के विदेश मंत्रालय से भी ज्यादा प्रो- चाइना रूख अपना लेते हैं । इसके पीछे यह खुशफहमी है कि चीन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में हमें प्रवेश की स्वीकृति देगा । यह कभी नहीं होने वाला है एक और बड़ा कारण है चीन पर हमारी अतिशय निर्भरता हम सेमी – कंडक्टर से लेकर मोबाईल तक चीन पर आश्रित हो चुके हैं । अगर नाँर्थ ब्लाक में बैठे अफसरान संजीदा होते तो वे ताईवान से सेमीकंडक्टर्स लेने का प्रस्ताव रखते और ऐसी सप्लाई चेन रचने की कोशिश करते, जिसमें हम चीन को पूरी तरह बायपास कर देते । इससे पहले यूक्रेन वाले मामले में भी हमारे सामने यही दुविधा की स्थिति बनी थी कि हम उस पर क्या रवैया अपनाए । रूस हमारा मित्र था । लेकिन जहां यूक्रेन की सुरक्षा हमारे लिए अप्रासंगिक थी, वहीं ताईवान की सुरक्षा से हमारे हित जुड़े हैं। ताईवान में आखिर ऐसा क्या हो रहा है अमेरिकी कांग्रेस की स्पीकर नैन्सी पेलोसी के द्वारा ताईवान की यात्रा करने को चीन के अक्षम्य बताया है । भारत के परिप्रेक्ष्य में इसे एसे समझें कि मानो नैन्सी पीओके गई हो , उसके नेताओं से मिली हों और यह बयान दिया हो कि अमेरिका आजाद कश्मीर की रक्षा करेगा । तब भारत कैसे प्रतिक्रिया करेगा । कम से कम चीन की तरह तो नहीं क्योंकि हमारे सबसे मुखर विरोध भी शालीन होते हैं, जबकि चीन तो फर्जी प्रोपगंडा और लडाई झगडे को आमादा हो जाता है ।