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shahidman009238
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अनुच्छेद 21 और 134 में मृत्युदण्ड के प्रति संकेत है युक्तियुक्त संदेह का फायदा अभियुक्त को दिया जाना चाहिए मृत्यु दण्डादेश विशेष कारण से दिया जाना चाहिए मृत्युदण्ड की सांविधानिक विधिमान्यता पर पुनर्विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं है। अपीलार्थी को हत्या के लिए सेशन न्यायाधीश द्वारा मृत्यु का दण्डादेश दिया गया था। उसकी अपील दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा खारिज की गई। उच्चतम न्यायालय में विशेष इजाजत लेकर की गई अपील भी खारिज की गई। उसके पश्चात् अपीलार्थी के पुनर्विलोकन याचिका और बाद में एक रिट याचिका उच्च्तम न्यायालय द्वारा खारिज की गई। अपीलार्थी के पुत्र ने संविधान के अनुच्छेद 72 के अधीन अपीलार्थी को क्षमा करने के लिए एक याचिका राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत की। उस याचिका में यह प्रार्थना की गई कि अपीलार्थी के प्रतिनिधि को राष्ट्रपति के समक्ष मौखिक सुनवाई का अवसर प्रदान किया जाए जिसके लिए इंकार कर दिया गया और राष्ट्रपति ने उक्त याचिका नामंजूर कर दी। अपीलार्थी के पुत्र ने दिल्ली उच्च न्यायालय में एक याचिका फाइल की जिसमें यह प्रार्थना की गई कि मृत्यु के दण्डादेश को निष्पादित करने से प्रत्यर्थी को अवरुद्ध करने के लिए आदेश दिया जाए। उच्च न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी। उसके तुरंत पश्चात् अनुच्छेद 32 के अधीन रिट याचिका के साथ विशेष इजाजत याचिका भी उच्चतम न्यायालय में फाइल की गई। उच्चतम न्यायालय ने रिट याचिका को ग्रहण करने का विनिश्चय किया और यह निदेश देते हुए आदेश किया कि अपीलार्थी को इस बीच फांसी न दी जाए। इन रिट याचिकाओं और अपील में अंतर्वलित विचारार्थ प्रश्न ये हैं कि क्या अनुच्छेद 72 के अधीन राष्ट्रपति की शक्ति न्यायिक पुनर्विलोकन के अंतर्गत है और क्या सिद्धदोष व्यक्ति का राष्ट्रपति के समक्ष मौखिक सुनवाई का अधिकार है उच्चतम न्यायालय द्वारा रिट याचिकाओं और विशेष इजाजत याचिका का तद्नुसार निपटारा करते हुए क्षमा करने की शक्ति सांविधानिक स्कीम का एक भाग है और न्यायालय को इस बारे में संदेह नहीं है कि भारत के लोकतंत्र में भी इसको इसी रूप में माना जाना चाहिए। जनता ने यह शक्ति संविधान के माध्यम से राष्ट्रपति को प्रदत्त की है और इसकी बहुत उच्च प्रास्थिति है। यह बहुत ही महत्व की सांविधानिक जिम्मेदारी है।