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shahidman009238
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अपीलार्थी ने दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के अधीन इस आवेदन के माध्यम से बस्ती के संयुक्त मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेश और दण्ड प्रक्रिया संहिता के धारा 145 के अधीन की कार्यवाहियों में बस्ती के प्रथम अपर सेशन न्यायाधीश द्वारा पारित आदेश के पुनरीक्षण को अभिखण्डित करने की मांग की है। प्रस्तुत आवेदन को जन्म देने वाले तथ्य ये हैं कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 145 के अधीन कार्यवाहियों के संबंध में प्रारंभ हुई। दोनों पक्षकारों ने लिखित कथन फाइल किए और विवादास्पद भूखण्ड के संबंध में अपने-अपने दावों के संबंध में साक्ष्य पेश किया। प्रस्तुत आवेदन के विरोधी पक्षकार संख्या 2 प्रथम पक्षकार था और आवेदक बृज बिहारी दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 155 के अधीन कार्यवाहियों में द्वितीय पक्षकार था। प्रथम पक्षकार जगदम्बिका प्रसाद ने अपने लिखित कथन में दावा किया कि उसने विवादास्पद भूखण्ड को रजिस्टर्ड विक्रय-विलेख द्वारा खरीदा था और वह तब से उस पर काबिज था। इस बात का भी प्रकथन किया गया है कि द्वितीय पक्षकार का उक्त भूखण्ड से कोई संबंध नहीं है और प्रथम पक्षकार से शांतिभंग होने का कोई खतरा नहीं है। द्वितीय पक्षकार बृज बिहारी ने अपने लिखित कथन में कहा कि प्रथम पक्षकार के पक्ष में निष्पादित विक्रय-विलेख शून्य था और यह एक धोकेबाज द्वारा किया गया था और द्वितीय पक्षकार उत्तराधिकार के आधार पर काबिज था। यह प्रकथन किया गया था कि विवादास्पद भूखण्ड के संबंध में दाखिल खारिज कार्यवाही संबंधित तहसीलदार के न्यायालय में लंबित थी और द्वितीय पक्षकार से शांतिभंग होने का खतरा नहीं था। दोनों पक्षकारों ने अपने लिखित कथन में निवेदन किया कि उनके विरुद्ध कार्यवाही समाप्त की जाए। दोनों पक्षकारों द्वारा साक्ष्य दिया गया। संबंधित विद्वान मजिस्ट्रेट ने उसके समक्ष दिए गए साक्ष्य के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि प्रथम पक्षकार जगदम्बिका प्रसाद प्रश्नगत प्लांट पर कार्यवाही शुरू करने की तारीख को काबिज था और वह उस समय तक विवादास्पद प्लाट पर कब्जे का हकदार था जब तक कि उसे विधि के सम्यक् अनुक्रम में बेदखल न कर दिया जाए। तद्नुसार उसने दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 145 के अधीन विवादास्पद भूखण्ड पर प्रथम पक्षकार के कब्जे में विघ्न को रोकने के लिए आदेश कर दिया।