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AbhishekShakya
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ग्रंथ जला दिए जाएंगे और भवनों का ध्वंस हो जाएगा। ऐसे में, एक ही स्थान शेष रह जाता है, जहां हम अपने ज्ञान, विद्या और संस्कृति को संरक्षित रख सकते हैं। वह है स्मृति। आज इसे हम क्लाउड कर रहे हैं, जहां चीजें एक अनिश्चित सीमा तक संरक्षित रखी जा रही हैं और उन्हें हम दोबारा हासिल भी कर पा रहे हैं। किसी इलेक्ट्रानिक ड्राइव में भी चीजें नष्ट हो जा रहीं, लेकिन क्लाउड यानी नेट में ये फिलहाल सुरक्षित हैं। संरक्षण की अपनी प्राचीन परंपरा को हम ध्यान से देखें, तो पाएंगे कि वैदिक युग में कला, विद्या और ज्ञान को स्मृति में संरक्षित रखने की स्थायी और सुदीर्घ परंपरा थी। वैदिक विद्वानों ने देश के इतिहास का भी जो काल निर्धारण किया, वह शिक्षा और स्मृति काल में सुविन्यस्थ था। गुरु अपने शिष्यों में पात्रता की दृष्टि से ज्ञान अंतरित करते थे। उनमें यह वैज्ञानिक आस्था थी कि इस ज्ञान का क्षय नहीं होगा। ज्ञान को अक्षुण्ण रखने की उनकी वह विधि वैज्ञानिक थी, जिसके आधार पर आज के वैज्ञानिक यह बात पूरे आत्मविश्वास से कह पाते हैं कि जो कुछ भी मनुष्य व्यवहार में व्यक्त होता है, वह ब्रह्मांड में संरक्षित रहता है। भारतीय अध्यात्म और संगीत में सुनी जाने वाली ध्वनि और संगीत के लिए उपयोगी ध्वनि को अनाहत नाद की व्युत्पत्ति के रूप में देखा, परखा और बरता गया है। वैदिक ऋषियों की तरह भर्तृहरि, कबीर और गोरख की सुदीर्घ परंपरा ने शब्द को योग की तरह बरता। शैव दर्शन में स्मृति या प्रत्यभिज्ञा के परिप्रेक्ष्य में नाद व बिंदु को उच्च व उत्तम स्थान प्राप्त हुआ। संगीत में भरत से लेकर सारंगदेव और आगे तक के संगीत मनीषियों ने ध्वनि के अनुभव को ब्रह्म का सहोदर घोषित किया। यह सुभाषित सुनिश्चित हुआ कि संसार में एक भी शब्द ऐसा नहीं, जिसमें मंत्र की शक्ति न हो। आखिर यह सब हमारी स्मृति में अभी तक सुचिन्हित कैसे है? प्रामाणिक उत्तर है मनुष्य की वह स्मृति, जो उसके मन से वृहत्तर आकाश तक फैली हुई है। यहां न कुछ नष्ट किया जा सकता है, न जलाया जा सकता है। मनुष्य अपनी स्मृति के शुक्लपक्ष से उस वृहत्तर आकाशीय स्मृति का स्पर्श तो कर सकता है, लेकिन नष्ट नहीं कर सकता। विनिमय में स्वयं नष्ट हो सकता है। सभ्यताओं की लगातार विनाशलीला के बावजूद यह देखा गया है कि मनुष्य के काम वही आता है, जो शाश्वत ज्ञान है। वही उसके जीवन में फिर से शुभता लाता है, जिसे जयशंकर प्रसाद मनु से प्रतीकित करते हैं। तो फिर उद्घाटित शुभता की ऐसी स्मृति के संरक्षण के लिए क्या आकाशीय स्मृति पर निर्भर नहीं होना चाहिए सिंधु सभ्यता की पाशुपत शैव दष्टि और वैदिक ऋषियों अपौरुषेय ज्ञान से लेकर रवींद्रनाथ और गोपीनाथ कविराज तक सभी वैश्विक मन का परामर्श देते हैं। इस वैश्विक मन की स्मृति में जाने और जानने के सिवाय आज मनुष्य के पास संरक्षित रखने को और रह ही क्या गया है