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Yashpal_Bharti


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ानून से ऊपर कोई नहीं है। यह टिप्‍पणी सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे मामले पर फैसला देते हुए की जिसमें उसके प्रमुख न्‍यायाधीश के कार्यालय को भी आरटीआइ यानी सूचना के अधिकार कानून के दायरे में लाने की मांग की गई थी। हालांकि यह एक आम व्‍यवस्‍था है कि संविधान और कानून की कसौटी पर देश के सभी नागरिक और समूची व्‍यवस्‍था को संचालित करने वाला हरेक व्‍यक्ति बराबर है, भले ही वह कितने भी ऊंचे पद पर या विशिष्‍ट क्‍यों हो, मगर यह भी सच है कि कुछ मामलों में महज धारणा और स्‍थापित परंपराओं की वजह से किसी व्‍यक्ति या पद को लेकर रियायत का रुख अपनाया जाता है। सर्वोच्‍च न्‍यायालय के प्रधान न्‍यायाधीश के कार्यालय को आरटीआई कानून के दायरे में लाया जाए या नहीं, इसी धारणा की वजह से पिछले कई सालों से ऊहापोह या विचार का विषय बना हुआ था। लेकिन बुधवार को सुप्रीम कोर्ट के पांच सदस्‍यीय संविधान पीठ ने यह साफ कर दिया कि शीर्ष अदालत के प्रमुख न्‍यायाधीश का कार्यालय अब सूचनाधिकार कानून के दायरे में आएगा। इससे सिर्फ जबावदेही और पारदर्शिता में इजाफा होगा, बल्कि न्‍यायिक स्‍वायत्‍तता भी मजबूत होगी। जब आरटीआई कानून लागू हुआ था, तभी उसमें यह स्‍पष्‍ट व्‍यवस्‍था थी कि कुछ अपवादों को छोड़ कर यह सब पर लागू होता है। यानी कुछ खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों के साथ राष्‍ट्रीय सुरक्षा से संबंधित संवेदनशील जानकारियों के अलावा अमूमन सभी मामलों में इस कानून के तहत सूचना देनी ही पड़ेगी। लेकिन न्‍यायपालिका के मामले में कोई स्‍पष्‍ट स्थिति सामने नहीं पा रही थी। हालांकि सन् 2010 में दिल्‍ली उच्‍च न्‍यायालय ने इस मामलों में साफतौर पर कहा था कि प्रधान न्‍यायाधीश का कार्यालय सूचना के अधिकार कानून के दायरे में आता है। और न्‍यायिक स्‍वतंत्रता किसी न्‍यायाधीश का विशेषाधिकार नहीं है, बल्कि उन्‍हें इसकी जिम्‍मेदारी सौंपी गई है। अब अपने ताजा फैसले में अदालत ने यही कहा कि सर्वोच्‍च न्‍यायालय के प्रधान न्‍यायाधीश का कार्यालय एक 'पब्लिक अथॉरिटी' यानी सार्वजनिक उपक्रम है। इसके सभी न्‍यायाधीश भी आरटीआई के दायरे में आएंगे। लेकिन निजता के दायरे को अगर छोड़ दिया जाए तो न्‍यायाधीशों के तबादले और पदोन्‍नति की प्रक्रिया में पारदर्शिता की अपेक्षा की गई थी। शायद यही वजह है कि अदालत ने पारदर्शिता के समांतर निजता के अधिकार को भी एक अहम चीज माना और प्रधान न्‍यायाधीश के कार्यालय से सूचना देते वक्‍त उसके संतुलित होने की अपेक्षा पर जोर दिया।
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