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Yashpal_Bharti
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सुप्रीम कोर्ट के पास पुलिस को किसी औपचारिक शिकायत का इंतजार किए बिन फौरन कानून कार्रवाई करके नफरत की भाषा से निपटने के वास्ते सक्रिय होने का निर्देश देने की पर्याप्त वजहें हैं। अदालत ने पुलिस को इस निर्देश के अनुपालन में किसी किस्म की कोताही बरतने पर अवमानना कार्रवाई करने की भी चेतानवी दी है। दिल्ली, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की पुलिस को लक्षित करके दिया गया अदलत का यह आदेश उसके सामने पेश नफरत फैलाने वाले भाषणों के अंतहीन सिलसिले से जुड़ी एक रिट याचिका के संदर्भ में आया है। अदालत ने बढ़ते नफरत के माहौल का जिक्र किया है और इस किस्म की घटनाओं से निपटने के कानूनी प्रावधान होने के बावजूद ज्यादातर मामलों में निष्क्रियता दिखाए जाने पर गौर किया है। यह बिल्कुल साफ है कि केंद्र और कुछ राज्यों में समान विचारधारा वाली सरकारें सांप्रदायिक सद्भाव, भाईचारे और शांति को लेकर अदालत के माफिक चिंतित नहीं हैं। दरअसल, उनमें से कुछ मिलीभगत करते हुए या तो सोची-समझी निष्क्रियता ओढ़कर या फिर बहुसंख्यकवादी तत्वों को कथित धार्मिक सभाओं में भड़काऊ भाषणों की इजाजत देकर माहौल को बिगाड़ने में योगदान दे रही हैं। सर्वोच्च अदालत का दखल इसलिए जरूरी हो गया है क्योंकि कई विवादास्पद धार्मिक नेता नागवार टिप्पणियां करने के बाद आसानी से बच निकल रहे हैं। इनमें से कुछ टिप्पणियां तो नरसंहार के आह्वान तक में लिपटी हुई हैं। इसी पृष्ठभूमि में, अदालत ने सभी धर्मों और सामाजिक समूहों के बीच धर्मनिरपेक्षता और बंधुत्व के संवैधानिक मूल्यों को रेखांकित किया है।
यह पिछले साल के अंत में हरिद्वार में आयोजित एक धार्मिक सम्मेलन से जुड़ा मामला है, जिसकी सुनवाई अब अदालत द्वारा की जा रही है। यही वो सम्मेलन था जहां से नफरत की भाषा को परवाज मिला। उस वक्त भी, अदालत ने सुधारात्मक उपाय करने को कहा था। नतीजतन, उत्तराखंड के रूड़की में स्थानीय अधिकारियों द्वारा इसी किस्म के एक और सम्मेलन पर रोक लगाई गई थी।
हिंदूु त्योहारों का एक विचलित करने वाला रूझाान सामने आया है, जिसमें धार्मिक जुलूसों का आयोजन एक रिवाज बन गया है। इसलिए अदालत को नफरत फैलाने के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने के लिए अधिकारियों पर दबाव बनाने के हरसंभव उपाय करने चाहिए।