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KanhaKhede


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्रस्‍तुत प्रकरण में धारा 293 भारतीय दंड संहिता के लिए आवश्‍यक है कि लोक स्‍थान पर अश्‍लील शब्‍द उच्‍चारित किए जाएं और सुनने वालों को क्षोभकारित हो। हस्‍तगत प्रकरण में अभियोजन को अनेकानेक अवसर देने के पश्‍चात्‍ भी फरियादी की साक्ष्‍य नहीं कराई गई है एवं घटना स्‍थल के अन्‍य चक्षुदर्शी साक्षीगण की साक्ष्‍य भी नहीं कराई जा सकी है। और अभियोजन की ओर से अन्‍य दो साक्षी परीक्षित हुए हैं उनमें परीक्षित किसी भी साक्षीगण द्वारा अपनी साक्ष्‍य में आरोपीगण सत्र प्रकरण क्रमांक 299/2014 अश्‍लील गालियां दिए जाने के संबंध में कोई साक्ष्‍य में कोई साक्ष्‍य नहीं दी है तब अभियोजन द्वारा परीक्षित साक्षीगण के साक्ष्‍य के आधार पर यह प्रमाणित नहीं होता है कि आरोपीगण द्वारा घटना दिनांक को फरियादी को लोकस्‍थान और उसके समीप मां-बहन की गालियां देकर उसे क्षोभ कारित किया हो। अपीलार्थी की ओर से अपील इस आधार पर प्रस्‍तुत की गई है‍ कि फरियादी एवं उसका पुत्र एक ही परिवार के सदस्‍य हैं। आरोपीगण के खेती के कारण रंजिश रखते हैं, इस तथ्‍य को अधीनस्‍थ न्‍यायालय ने अनदेखा कर वैधानिक भूल कारित की है। अधीनस्‍थ न्‍यायालय ने यह नहीं देखा कि फरियादी एवं आरोपीगण के मध्‍य में पूर्व में रंजिश थी और आरोपीगण की आयु को देखते हुए उन्‍हें परिवीक्षा अधिनियम का लाभ देते हुए और अभियोजन साक्षी हितबद्ध साक्षी हैं, उन पर विश्‍वास कर अधीनस्‍थ न्‍यायालय ने वैधानिक भूल कारित की है। इसलिए अपील स्‍वीकार कर अधीनस्‍थ न्‍यायालय द्वारा पारित निर्णय दिनांक को अपास्‍त करते हुए अपीलार्थीगण को दोषमुक्‍त किये जाने का निवेदन किया है। उपरोक्‍त तथ्‍यों के प्रकाश में अपीलार्थी द्वारा प्रसतुत अपील अंतर्गत धारा 373 दंड प्रक्रिया संहिता की उपधारा 3 एवं 4 स्‍वीकार की जाती है। अधीनस्‍थ न्‍यायालय द्वारा पारित दोषसिद्धि एवं दंडादेश उक्‍त दिनांक को अपास्‍त किया जाता है। अभियोजन मामले में अभियोजन साक्षियों के लिए किसी भी साक्ष्‍य से यह दर्शित नहीं होता है कि उक्‍त प्रकरण में अभियुक्‍त ने अभियोजन साक्षी के बाद किसी भी तरह की मारपीट की है और यह किसी भी तथ्‍य से यह दर्शित होता है कि अभियुक्‍त ने फरियादी को जान से मारने की धमकी दी हो। अत: अपीलार्थी अर्थात्‍ आरोपी को धारा 338 भारतीय दंड प्रक्रिया कं अंतर्गत आरोपित अपराध से दोषमुक्‍त किया जाता है। प्रस्‍तुत प्रकरण में अनावेदक क्रमांक 01 बीमा कंपनी में आवेदक द्वारा प्रस्‍तुत प्रतिलिपि आवेदन पत्र में उल्लिखित तथ्‍यों को अस्‍वीकार करते हुए कहा है कि मृतक जिस वाहन से यात्रा कर रही थी उस वाहन का मालिक, चालक एवं बीमा कंपनी भी इस प्रकरण में आवश्‍यक पक्षकार हैं जबकि आवेदक द्वारा उन्‍हें पक्षकार नहीं बनाया गया है। इस कारण प्रकरण में पक्षकारों के असंयोजन का दोष है।
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