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Ghulam_Mustafa
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प्रतिवादी संख्या ने यह वर्णित करते हुए किया है कि वादी और प्रतिवादी संख्या 01 के बीच कोई करार नहीं हुआ था। प्रतिवादी संख्या 01 ने किसी विक्रय विलेख को निष्पादित करने के लिए कोई संदेश नहीं भेजा था। उसने ऐसे संव्यवहार को अस्वीकार किया। अपने लिखित कथन में प्रतिवादी संख्या 01 ने ऐसे आशयित संव्यवहार के प्रति अग्रिम धनराशि के रूप में किसी धनराशि की अभिस्वीकृति की प्राप्ति को भी अस्वीकार किया है। यह भी अभिकथित किया जाता है कि अचल संपत्ति के विक्रय के लिए कोई मौखिक करार भी नहीं किया जा सका था। लिखित कथन पूर्ण रूप से अस्वीकार करता था। प्रतिवादी संख्या 02 ने यह कहा कि उसको किसी ऐसे संव्यवहार की जानकारी नहीं थी और यद्यपि निबंधक के कार्यालय में वादी अपने दावे को कायम नहीं कर सकता था। वादी ने एक हजार रुपए की अभिकथित प्राप्ति को दर्शित किया था। प्रतिवादी संख्या 01 से पूछने पर उसने कहा कि वह किसी संव्यवहार को कभी नहीं किया था और ऐसी प्राप्ति कूटरचित है। अत: प्रतिवादी के संक्षिप्त कथन पर विश्वास करते हुए उसने तीस हजार रुपए की प्रतिफल के लिए विक्रय विलेख निष्पादित किया था। उसके अनुसार वह सद्भावपूर्ण क्रेता है। आगे यह भी कहा गया है कि विक्रय विलेख के निरस्तीकरण के मामले में वादी द्वारा प्रतिवादीं संख्या 01 को किया गया प्रतिफल का भुगतान उसको करना चाहिए। वादी को स्वयं परीक्षित किया गया है और यह दावा करते हुए प्राप्ति को साबित किया है कि प्रतिवादी संख्या 01 प्रतिफल का भाग के रूप में प्राप्ति को निर्गत किया है। वह साक्ष्य में उसने कहा कि वह संविदा के अपने भाग का पालन करने के लिए तैयार था और तैयार है। वह संदेशवाहक का नाम भी दिया है जो प्रतिवादी संख्या 01 के संदेश के संबंध में सूचना देने के लिए उसके घर आया था। प्रतिवादी संख्या 01 ने परीक्षा में प्रतिवादी से किसी प्रकार का संव्यवहार होने, किसी मौखिक संदेश भेजने और प्राप्ति को जारी करने से अस्वीकार किया है। प्रतिपरीक्षा में उसने प्राप्ति पर, लिखित कथन पर और वकालतनामा पर भी अपने हस्ताक्षर को स्वीकार किया था। इस प्रकार उसने अपने हस्ताक्षर को अच्छी प्रकार से स्वीकार किया है।