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Rohit_Kumar_Kushwaha


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भियुक्‍त के विद्वान स्‍थायी अधिवक्‍ता श्री केशरवानी ने यह अनुरोध किया है कि व्‍यापार कर अधिकरण द्वारा याची के पक्ष में पारित किए गए आदेश जिसमें माल को निर्मुक्‍त करने का निदेश किया गया था के विरुद्ध विभाग ने भी 2000 का व्‍यापार कर पुनरीक्षण आवेदन फाइल किया था जिसे याची द्वारा फाइल किए गए व्‍यापार कर पुनरीक्षण के साथ संबद्ध कर दिया गया है। इस प्रकार विभाग द्वारा आदेश स्‍वीकार नहीं किया गया है। विद्वान अधिवक्‍ता ने यह भी निवेदन किया है कि अधिक‍रण ने याची की अपील को मंजूर करते हुए अपने आदेश में अभिलिखित निष्‍कर्ष में सहायक आयुक्‍त को यह निदेश दिया था कि वह अधिनियम की धारा 13 के अधीन फाइल किए गए याची के आवेदन का विनिश्‍चय करे और यह निदेश इस प्रभाव का है कि चूंकि माल क्रेता के पास नहीं पहुंचा है और परिदान नहीं किया गया है, इसलिए इस संविदा को पूर्ण नहीं माना जा सकता और विक्रेता का माल पर अधिकार है। विधिक पहलू की परीक्षा किए बिना संक्षिप्‍त कार्यवाही में यह निदेश दिया गया था, इसलिए इसे आबद्धकारी नहीं माना जा सकता। विद्वान काउंसेल ने आगे यह और दलील दी है कि याची ने अपने इस कथन को साबित करने के लिए कि माल संविदा बिल्‍टी के स्‍थान के लिए की गई थी और माल का परिदान करने के पश्‍चात् क्रेता द्वारा कीमत का संदाय किया जाएगा। इस बाबत् उसने माल परिवहन रसीद या संविदा की प्रति फाइल नहीं की है, इसलिए उन्‍होंने यह दलील दी है कि ऐसे दस्‍तावेजों के अभाव में याची के विरुद्ध यह उपधारणा की जा सकती है कि माल पर हक ग्राहक को संक्रांत कर दिया गया था और याची केवल धन प्राप्‍त करने का हकदार था और वह अपने धारणाधिकार का प्रयोग नहीं कर सकता है। विद्वान काउंसेल ने आगे यह और दलील दी है कि बंडल के लिए कंपनी ने जो प्रारूप जारी किया था वह प्रारूप वास्‍तव में कंपनी को जारी नहीं करना था और इस प्रकार वास्‍तव में दोनों फर्म एक ही हैं और व्‍यापार कर प्राधिकारियों ने कंपनी से शोध्‍य बकाया कर की वसूली के लिए माल को निरुद्ध करके न्‍यायोचित्‍य किया है।
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