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ो. यूनुस खान बनाम उत्‍तर प्रदेश राज्‍य एवं अन्‍य (2010), 10 एससीसी 539, उच्‍च न्‍यायालय ने माना कि अनुशासनात्‍मक प्राधिकारी और अपीलीय प्राधिकारी द्वारा पारित आदेश कानून में अस्थिर थे। उच्‍च न्‍यायालय ने पाया कि अनुशासनात्‍मक प्राधिकारी द्वारा दर्ज किए गए और अपीलीय प्राधिकारी द्वारा पुष्टि किए गए निष्‍कर्ष विकृत थे और किसी भी सबूत पर आधारित नहीं थे। उच्‍च न्‍यायालय ने पाया कि अपीलीय प्राधिकारी ने स्‍वतंत्र रूप से अपना दिमाग नहीं लगाया और अपील को खारिज करते समय अनुशासनात्‍मक प्राधिकारी के निष्‍कर्षों को काट दिया और चिपका दिया। अपीलकर्ता बैंक की ओर से हमारे सामने यह तर्क दिया गया था कि उच्‍च न्‍यायालय ने सबूतों की फिर से सराहना करने और प्रतिवादी को दोषी नहीं ठहराने में अपने अधिकार क्षेत्र का उल्‍लंघन किया है। यह तर्क दिया गया था कि जब तक कुछ सबूत थे। जिन पर अनुशासनात्‍मक प्राधिकरण अपने निष्‍कर्षों को आराम दे सकता था, ऐसे सबूतों की पर्याप्‍यता या अपर्याप्‍यता पर रिट कोर्ट द्वारा विचार नहीं किया जा सकता था। वैकल्पिक रूप से, यह प्रस्‍तुत किया गया था कि भले ही अनुशासनात्‍मक प्राधिकारी या अपीलीय प्राधिकारी द्वारा पारित आदेशों में उनके द्वारा दर्ज किए गए निष्‍कर्षों के समर्थन में कारणों की अनुपस्थिति या अपर्याप्‍तता के कारण कोई कमजोरी हो, तो उच्‍च न्‍यायालय के लिए उचित कदम मामले को नए सिरे से आवश्‍यक कार्यवाही करने के लिए मामले को अपीलीय प्राधिकारी या अनुशासनात्‍मक प्राधिकारी के पास वापस भेजना था जैसा भी मामला हो। दूूसरी ओर प्रतिवादी की ओर से यह तर्क दिया गया था कि प्रतिवादी के खिलाफ की गई जांच और जांच अधिकारी, अनुशासनात्‍मक प्राधिकारी और अपीलीय प्राधिकारी द्वारा निकाले गए निष्‍कर्ष में घातक दोष थे। सबसे पहले, क्‍योंकि जांच अधिकारी द्वारा की गई जांच अनुचित थी और इसके परिणामस्‍वरूप प्रतिवादी को अपने बचाव में सबूत पेश करने का उचित अवसर प्रदान करने में जांच अधिकारी की विफलता के कारण न्‍याय की घोर हानि हुई है।
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