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gccmorena
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बीज हमेशा हमें दिखाई नहीं देता। वह अपना काम जमीन के नीचे करता है और जब खुद मिट जाता है तब पेड़ जमीन के ऊपर देखने में आता है। कांग्रेस के बारे में ऐसा ही समझिये। जिसे आप सही जागृति मानते हैं वह तो बंग-भंग से हुई जिसके लिए हम लार्ड कर्जन के आभारी हैं। बंग-भंग के वक्त बंगालियों ने कर्जन साहब से बहुत प्रार्थना की लेकिन वे साहब अपनी सत्ता के मद में लापरवाह रहे।
उन्होंने मान लिया कि हिन्दुस्तानी लोग सिर्फ बकवास ही करेंगें। उनसे कुछ भी नहीं होगा। उन्होंने अपमान भरी भाषा का उपयोग किया और जबरदस्ती बंगाल के टुकडे क़िये। हम यह मान सकते हैं कि उस दिन से अंग्रेजी राज्य के भी टुकडे हुए। बंग-भंग से जो धक्का अंग्रेजी हुकूमत को लगा वैसा और किसी काम से नहीं लगा। इसका मतलब यह नहीं कि जो दूसरे गैर इन्साफ हुए वे बंग-भंग से कुछ कम थे। नमक महसूल कुछ कम गैर इन्साफ नहीं है। ऐसा और तो आगे हम बहुत देखेंगे। लेकिन बंगाल के टुकडे क़रने का विरोध करने के लिए प्रजा तैयार थी।
उस वक्त प्रजा की भावना बहुत तेज थी। उस समय बंगाल के बहुतेरे नेता अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार थे। अपनी सत्ता अपनी ताकत को वे जानते थे। इसलिए तुरन्त आग भड़क उठी। अब वह बुझने वाली नहीं है, उसे बुझाने की जरूरत भी नहीं है। ये टुकड़े कायम नहीं रहेंगे। बंगाल फिर एक हो जायगा लेकिन अंग्रेजी जहाज में जो दरार पड़ी है वह तो हमेशा रहेगी ही। वह दिन-ब-दिन चौड़ी होती जायगी।
जागा हुआ हिन्द फिर सो जाय, यह नामुमकिन है। बंग-भंग को रद्द करने की मांग स्वराज्य की मांग के बराबर है। बंगाल के नेता यह बात खूब जानते हैं। अंग्रेजी हुकूमत भी यह बात समझती है। इसीलिए टुकडे रद्द नहीं हुए। ज्यों दिन बीतते जाते हैं, त्यों त्यों प्रजा तैयार होती जाती है। प्रजा एक दिन में नहीं बनती। उसे बनने में कई बरस लग जाते हैं।