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sanish_yadav
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दिल में अभी तक वह पहली हवाई उड़ान का रोमांच बचा हुआ है और तब से दक्षिण भारत से जो रिश्ता जुड़ा वह प्यार भी बरकरार रहा है। राज् कमल, भारत भाषा, कला, साहित्य, सिनेमा, संस्कृति, नृत्य, वस्त्र-परिधान, खान-पान जैसे कई मामलों में इतना विविध है कि अलग-अलग राज्य, अलग-अलग देश जैसे लगते हैं; लेकिन फिर भी भारत में पूर्व-पच्छम, उत्तर-दक्खिन, पांडिचेरी (स्थानीय नाम पुदुच्चेरी) कहीं भी जाओ—‘भारतीयता’ का एक सामूहिक, अदृश्य अनुबंध आपको घेर ही लेता है। कानों में जैसे पंडित भीमसेन जोशी की आवाज़ में अस्सी के दशक में दूरदर्शन पर आता वह गीत ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ गूँजने लगता है। यही है हमारी भारतीयता। भारत में हर एक राज्य का अपना अलग सौंदर्य है, लेकिन दक्षिण भारत में एक बात जो मुझे सबसे ज़्यादा पसंद आई—वह है यहाँ की सादगी। यहाँ जीवन बहुत शांत और सहज महसूस होता है और क़िस्मत से मेरा यहाँ पर बार-बार आना भी होता रहता है। जब साल 2002 में मुंबई साहित्य अकादेमी की ओर से लेखकों को दी जाने वाली ट्रैवेल ग्रांट मिली, तब मुझे अपने साहित्यिक प्रवास के लिए भारत का कोई भी एक राज्य पसंद करने का विकल्प दिया गया था और मैंने ‘केरल’ जाने का फ़ैसला किया। तब वहाँ पर मैंने चर्चित लेखिका कमला दास (जो उस वक़्त कमला सुरैय्या बन चुकी थीं) के घर जाकर उनसे मुलाक़ात की थी। उस वक़्त एयरपोर्ट से होटल जा रही थी कि तब रास्ते में एक मंदिर के पास से टैक्सी गुज़र रही थी और मैंने देखा।