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ErSanjeevRathore
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आज यातायात के अनेक साधन विज्ञान ने हमें उपलब्ध कराए हैं। साइकिल से लेकर वायुयान तक अनेक प्रकार के यातायात के साधनों ने दूरी को कम कर दिया है। आज हम विश्व के किसी भी कोने में थोड़े समय में ही पहुँच सकते हैं। इन साधनों में रेलगाड़ी ही सबसे सुगम, कम खर्चीली एवं उपयोगी है। भारत की अधिकतर जनता रेलगाड़ी से ही यात्रा करती है। भारत में रेलों का जाल-सा बिछा है। कुछ दूरी पर इनके स्टेशन बना दिये गये हैं जिन पर रेलों को रुकना है। कुछ मेल गाड़ियाँ हैं वे छोटे स्टेशनों पर नहीं रुकती है। स्टेशनों पर दो, तीन या चार बडे-बड़े प्लेटफार्म होते हैं। यात्री इन्हीं प्लेटफार्मों पर रेल का इन्तजार करते हैं। यहाँ पर हर समय भीड़ दिखाई देती है। यहाँ पर यात्रियों के बैठने के लिए बैंचें, पंखे, पीने के लिए पानी, शौचालय, जमानती सामान घर, विश्रामालय, प्रतीक्षालय, तारघर, भोजनालय आदि अनेक सुविधाएँ उपलब्ध रहती है। यात्रियों की सुरक्षा के लिए पुलिस होती है। यात्रियों के मार्गदर्शन के लिए अधिकारी भी होते हैं। यात्रिायों का सामान उठाने के लिए रेलवे के कुली होते हैं। रेलवे प्लेटफार्म पर सामान बेचने वाले होते हैं। फल वाले भी होते हैं। गाड़ी के आने पर इनकी चहल-पहल बढ़ जाती है। रेलगाड़ी से सम्बन्धित सूचना ‘पूछताछ’ खिड़की से मिल जाती है। एक दिन मैं अपने मित्र को छोड़ने के लिए अपने पिताजी के साथ राजामण्डी स्टेशन पर गया। मित्र को ‘ताज’ गाड़ी से दिल्ली जाना था। शाम के सात बज चुके थे। स्टेशन पर बिजली जगमग जल रही थी। रेलवे स्टेशन का दृश्य बड़ा-ही रोचक और आकर्षक था। यात्रियों की भीड़ अधिक थी। हम टिकिट लेकर एक बैंच पर बैठ गये। अभी गाड़ी के आने में आधा घंटा था। मैंने एक किताब की दुकान से एक कहानी की किताब ली और मित्र को दे दी।
मैं रुपया हूँ। मुझे अपने रुपया होने पर गर्व है। मैं आज सर्वश्रेष्ठ पद पर प्रतिष्ठित हूँ। मेरा कद मनुष्य से भी बड़ा है। मनुष्य मेरा सेवक और गुलाम है। वह मेरे लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाता है। प्राचीन-से-प्राचीन परम्परा, बड़े-से-बड़े जीवन मूल्य, घनिष्ठ-से-घनिष्ठ सम्बन्ध मेरे अभाव में कुछ भी नहीं हैं। संसार के सभी मनुष्य मुझे अधिक से अधिक संख्या में पाने के लिए लालायित रहते हैं। इस प्रकार मुझे अधिक से अधिक संख्या में पाने के लिए लालायित रहते हैं। इस प्रकार मेरा प्रभाव प्यापक है। संसार में आने से पूर्व मैंने बड़ी साधना की है। सैकड़ों वर्षों तक पृथ्वी के गर्भ में रहकर मैंने कठिन यातनाएँ सहीं। फिर एक दिन वैज्ञानिककों ने मेरी खान का पता लगाया और मुझे कच्चे लोहे के रूप में बाहर निकाला। फिर आग की भट्टी में डालकर मुझे शुद्ध किया गया। मैंने कितनी तकलीफ सही, बता नहीं सकता। फिर मुझे टकसाल में लाकर सिक्के का रूप दिया गया। अब मैं चमचमाता हुआ अपने अन्य साथियों के साथ खुशी से खेलने लगा। मुझे लोहे, चाँदी और सोने की गिन्नी के रूप में भी बनाया गया। लोहे के सिक्के की कीमत एक रुपया रही जबकि चाँदी के सिक्के की कीमत कुछ सौ रुपये और सौने की गिन्नी के रूप में भी बनाया गया। लोहे के स्कि की कीमत ।
मैं एक रुपये का सिक्का हूँ। मैं अपनी कीमत और आकार से सन्तुष्ट हूँ। मुझे बच्चे बहुत प्रिय लगते हैं और बच्चों को मैं प्रिय लगता हूँ। मेरे बाद कागज के नोटों का प्रचलन भी हुआ पर मेरा सम्मान उसी प्रकार कायम है। सागर से प्राप्त लक्ष्मीजी मेरी देवी हैं। मुझे प्राप्त करने के लिए लोग लक्ष्मी देवी की पूजा-अर्चना करते हैं। विश्व में सभी जगह मेरी महिमा व्याप्त है। यदि कोई भारत से विदेश में जाता है तो मेरे बदले वहाँ के सिक्के ले लेता है। मैं एक नन्हें-मुझे मुन्ने की गुल्लक में बन्द था। मेरे साथ अन्य भाई-बहन थे जिनके साथ मैं खूब खेलता था। एक दिन जब गुल्लक भर गई तो उस बच्चे ने गुल्लक तोड़कर हमें निकाल लिया।