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भारत में छह ऋतुए पाई जाती हैं जिनके नाम गर्मी व वर्षा व शरद व हेमंत तथा शिशिर और वसंत हैं। इनमें वसंत को ऋतुराज और वर्षा को ऋतुओं की रानी कहा जाता है। यदि मैं सच कहूं तो वर्षा ही वह ऋतु है जिसका लोग सर्वाधिक आतुरता से इंतजार किया करते हैं। कुछ समय पूर्व तक भारतीय कृषि को मानसून का जुआ कहा जाता था। ऐसा इसलिए कहा जाता था कि भारतीय कृषि पूरी तरह से वर्षा पर निर्भर होती थी तथा गर्मी के मारे पशु व पक्षी तथा इंसान सभी बेहाल हो जाते थे। छोटे छोटे वृक्ष व पौधे सूख जाते थे। धरती गर्म तवे सी तपने लगती थी। ऐसे में सभी बहुत आतुरता से वर्षा का इंतजार करते लगते थे। मुझे याद है कि आषाढ माह के पंद्रह दिन यूं ही तपते तपते बीत जाते थे और इस समय गर्मी अपने चरम पर होती थी। ऐसे में सभी को बेसब्री से वर्षा का इंतजार रहता था परंतु बादल मानो रूठे से रहते थे। बालक तो कई बार टोली बनाकर जमीन पर लेट लेटकर गाने लगते कि काले मेघा पानी दे पानी दे गुडधानी दे। इस तरह गा-गा कर बालक बादलों को बुलाते थे पर सब बेकार साबित होता था। फिर एक दिन कुछ यूं हुआ कि दोपहर का समय था व अचानक बादलों के कुछ टुकडों ने पहले तो सूरज को ढक लिया और फिर वे बादल पूरे आसमान में छा गए। देखते ही देखते हवा में शीतलता का एहसास होने लगा। दिन में ही शाम होने का एहसास होने लगा। अचानक बिजली चमकी और बादलों ने अपने आने की सूचना मानो सभी को देदी और आसमान से शीतल बूंदें गिरने लगीं। फिर धीरे धीरे ये बूंदें घनी और बडी होने लगीं तथा धीरे धीरे बूंदों की एक झडी सी लग गई। फिर हवा के एक दो तेज झोंके आए और तेज वर्षा शुरू हो गई। वर्षा का वेग बढने के साथ-साथ हमारे मन की उमंग एवं खुशी भी बढती जा रहा थी। फिर हम बालक कहां रुकने वाले थे। हम नहाने के लिए घर से निकल आए। गर्मी की ऋतु ने हमें जितना तपाया था अब वह सारी तपन हम वर्षामें शीतल कर लेना चाहते थे। वर्षा भी कितनी शीतल और सुखद लगती है। यह तो भीगने वालों से ही जाना जा सकता है। हम सभी बालक जम कर नहाए और खूब धमाचौकडी भी की। कोई उछल कूद कर रहा था तो कोई बारिश में नाच रहा था। कुछ बालक कागज की नाव बना कर पानी में चलाने लगे। दो घंटे की लगातार वर्षा में सब कुछ जल मगन हो गया। खेतों व बागों तथा गलियों की नीची जगहें तालाब का रूप धारण कर चुकी थीं। वृक्ष व पौधे बिलकुल नहाए धोए और सुंदर लगने लगे थे। लोगों के चेहरों पर छायी मायूसी गायब हो चुकी थी और अब उन चेहरों पर मायूसी की जगह चमक थी। जंगल की ओर से मयूरों की कर्णप्रिय आवाज जोर-जोर से आने लगी थी। सभी किसान खेत की ओर चल पडे। ऐसे में हम बालक कहां शांत बैठने वाले थे। हम भी कागज की नाव लिए तालाब की ओर चल पडे। हमें भी अभी जल क्रीडा का और आनंद लेना था। तालाब पानी से लबा लब भर गया था। सभी बालकों ने तालाब में अपनी अपनी नाव डाली व जोर शोर से उनको चलाने लगे।