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जहां तक न्यायालय के क्षेत्राधिकार का प्रश्न है, यह स्पष्ट किया गया है कि यह अधिकार क्षेत्र सर्वांगीण है भले ही इसका प्रयोग करते समय न्यायालयों ने कुछ नीति निर्धारित सिद्धांतों का पालन किया हो पर वे सिद्धांत न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को किसी तरह भी कम नहीं करते। वैसे भी अपराध समाज के निर्धारित नियमों का उल्लंघन ही होता है और इसी कारण प्रत्येक अपराध का समाज से प्रत्यक्ष संबंध होना माना जाता है। ऐसी स्थिति में अपराधी को दण्डित करना न्यायालयों का सामाजिक दायित्व भी होता है। इस सामाजिक दायित्व का बोध दोषमुक्ति के आदेश के विरूद्ध अपील का निराकरण करते समय भी होना चाहिए। तथापि, इसका तात्पर्य यह भी नहीं है कि किसी निर्दोष व्यक्ति को दण्डित किया जावे। वैसे भी निर्दोष व्यक्ति को दण्डित किए जाने से समाज में आक्रोश बढ़ता है घटता नहीं। फलस्वरूप न्यायालयों का यह दायित्व है कि वे उपलब्ध साक्ष्य का विधिवत् विश्लेषण कर अपराधी को दण्डित करने का भरपूर प्रयास करें। पर ऐसा प्रयास करते समय उन्हें यह भी हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि उनके द्वारा किसी निर्दोष व्यक्ति को दण्ड न दिया जावे। यही इस देश का न्यायिक आत्मबोध है और यही न्यायिक परम्परा भी। न्यायिक परम्परा की पुष्टि करने का अधिकार सभी न्यायालयों को होता है। यह सत्य है कि जब तक किसी व्यक्ति के विरूद्ध अपराध सिद्ध न हो उसे अपराधी नहीं माना जा सकता पर इसका तात्पर्य यह तो नहीं कि आरोपी, जिस पर आरोप लगाकर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया गया है उसे अपराध करने में पूर्णत: अक्षम मानकर उसके विरूद्ध लगाए गए आरोपों का निराकरण किया जावे। आरोपी के निर्दोष होने की अवधारणा और उसके अपराध करने की अक्षमता की अवधारणा दो भिन्न स्थितियां हैं। प्रथम स्थिति में उसे साधारण मानव जो अपराध कर भी सकता है और नहीं भी कर सकता है स्वरूप मानकर उसके विरूद्ध लगाए गए आरोपों का निराकरण किया जाता है पर दूसरी स्थिति में उसे सर्वगुणसम्पन्न निरपराध व्यक्ति मानकर उसके विरूद्ध लगाए गए आरोपों की जांच की जाती है। शायद ही ऐसा कोई मनुष्य होगा कि सर्वगुणसम्पन्न और अपराध करने में पूर्णत: अक्षम हो। ऐसी परिकल्पना तो इस देश में केवल भगवान की है।