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riteshsingh


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हते हैं, जिन रंगों में एक ही खून दौड़ता है, वह रिश्‍ता कभी पराया नहीं होता। रक्षाबंधन के अवसर पर जब बहनें भाईयों की कलाई पर स्‍नेह और विश्‍वास का धागा बांधती हैं, तो यह सोचना लाजमी हो जाता है कि आखिर भाई-बहन होना जिंदगी को इतना समृद्ध क्‍यों बना देता है। यह सिर्फ एक भावनात्‍मक बंधन नहीं, बल्कि विज्ञान, दर्शन और भारतीय संस्‍कृति तीनों इस बात की गवाही देते है कि सहोदर यानी सगे भाई-बहनों का साथ इंसान के व्‍यक्तित्‍व की सबसे पहली और सबसे टिकाऊ पाठशाला है। घर में जब पहली बार कोई बच्‍चा छोटे या बड़े भाई-बहन के साथ खिलौना बांटना बारी का इंतजार करना या किसी झगड़े के बाद गले मिलना सीखता है, तो असल में वह जीवन का सबसे बड़ा सबक सीख रहा होता है साथ रहने की कला। अमरीकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन की रिपोर्ट के अनुसार सिबलिंग होना बच्‍चों में सहानुभूति, समझौता करने की क्षमता और सामाजिक कौशल विकसित करने में असरदार साबित होता है, क्‍योंकि यह रिश्‍ता बराबरी के धरातल पर पनपता है। एक शोध में सामने आया कि जो बच्‍चे परिवार में सबसे बाद में जन्‍मे वे बड़े भाई-बहनों से मिली सामाजिक समझ के कारण मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य के कुछ पैमानों पर बेहतर पाए गए। यहां यह सीख दोतरफा बहती है। यह विडंबना ही है कि जिस भारत में परिवार व्‍यवस्‍था कभी संयुक्‍त परिवारों की नींव पर टिकी थी, वहां आज एकल-संतान परिवारों की संख्‍या तेजी से बढ़ रही है। लेकिन इसी विडंबना के बीच भारतीय समाज में भाई-बहन के रिश्‍ते का सांस्‍कृतिक सामाजिक महत्‍व और भी गहरा हो जाता है। जहां पश्चिमी समाजों में व्‍यक्तिवाद को प्राथमिकता दी जाती रही है, वहीं भारतीय दर्शन का मूल स्‍वर सामूहिकता और वसुधैव कुटुम्‍बकम रहा है। ऐसे समाज में भाई-बहन का रिश्‍ता सिर्फ पारिवारिक ढांचे का हिस्‍सा नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा, आर्थिक सहारे और भावनात्‍मक संबल का एक मजबूत स्‍तंभ रहा है चाहे वह बुजुर्ग माता-पिता की साझा जिम्‍मेदारी लेने का हो या मुश्किल वक्‍त में एक दूसरे के लिए खड़े होने का हो। रक्षाबंधन इसी भावना का उत्‍सव है। यहां तक कि चचेरे, ममेरे, मुंहबोले भाई-बहन भी राखी के धागे से उतने ही सच्‍चे बन जाते है, जितने कि सगे। यही भारत की सबसे बड़ी सामाजिक बुद्धिमत्ता है।
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