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riteshsingh
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महर्षि के आश्रम में पांचाल देश का रहने वाला बालक आरूणि शिक्षा प्राप्त कर रहा था। एक बार आश्रम के क्षेत्र में तेज वर्षा होने लगी। महर्षि धौम्य को चिंता होने लगी कि पानी के बहाव से यदि उनके धान के खेत की मेड़ टूट गई तो पूरी फसल नष्ट हो जाएगी। उन्होंने आरूणि को बुलाकर कहा, बेटा आरूणि तुम खेत पर जाकर देखो कि पानी रोकने वाली मेड़ टूट गई हो तो उसे ठीक कर देना। अपने गुरूजी की आज्ञा मानकर आरूणि तुरंत खेत की और निकल गया। वहां जाकर उसने देखा कि मेड़ एक जगह से टूट चुकी थी और खेत में पानी जा रहा था। उसने आसपास की मिट्टी पत्थर से टूटी मेड़ को बांधने का पूरा प्रयास किया लेकिन पानी का बहाव उसे टिकने ही नहीं दे रहा था। उसे लगा कि ऐसे तो गुरूजी की फसल बर्बाद हो जाएगी। तब वह स्वयं टूटी हुई मेड़ के स्थान पर लेट गया। उसके शरीर के अवरोध से पानी का बहाव रूक गया। उधर रात होने पर जब आरूणि आश्रम में नहीं लौटा तो महर्षि मशाल लेकर खेत की ओर बढ़े और आरूणि को पुकारने लगे। पानी में भीगते रहने के कारण आरूणि कंपकपाते स्वर में बोला गुरूजी मैं पानी रोकने के लिए मेड़ पर लेटा हूं। आरूणि की गुरूभक्ति देखकर महर्षि की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने तुरंत बालक आरूणि को उठाया और अपने हृदय से लगा लिया।