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प्रतिलेखन संख्या-2

created Nov 14th, 17:38 by Vimlesh Gupta


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    महोदय, मेरे लिए जिसने विज्ञान को बाहर से ही महसूस किया है, यह असमंजस की बात है कि इसके बारे में उन लोगों से कुछ निवेदन करूँ जो इसकी विभिन्न शाखाओं में पारंगत विज्ञानी हैं। लेकिन मैंने आपका निमंत्रण इसलिए स्वीकार किया कि इससे मुझे विज्ञान-जगत के साथ संपर्क करने का मौका मिलता है। आपने इस अधिवेशन के लिए एक महिला वैज्ञानिक को अध्यक्ष चुना है, इसकी मुझे खुशी है। मुझे आशा है कि आप मेरी इस प्रसन्नता के लिए मुझ पर नारी जाति का पक्षपात करने की बात नहीं सोचेंगे। यह अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष की अच्छी शुरूआत है। सबसे महत्वपूर्ण विज्ञान है जीव-विज्ञान। ज्ञान के अन्वेषण का क्रम अनंत है। उसकी दो प्रेरणाएँ रही हैं। पहली प्रेरणा तो मनुष्य की अस्तित्व बनाए रखने की चिंता या जिजीविषा रही है और दूसरी उसकी चिर-अतृप्त ज्ञान-पिपासा रही है। इन दोनों में कोई टकराव नहीं है। वे कभी-कभी समानांतर चलते रहे हैं, परंतु अनेक बार वे एक-दूसरे में मिल गए हैं और एक-दूसरे की परितृप्ति करते रहे हैं। एक से व्यावहारिक विज्ञान का उदय हुआ और दूसरे से मूल विज्ञान का भारत में हमें इन दोनों की आवश्यकता है। जब हम अधिसंख्य लोगों के जीवनयापन के स्तर को ऊँचा उठा पाएँगे, तभी हम थोड़े से प्रतिभाशाली लोगों के लिए उच्चतर लक्ष्यों की प्राप्ति के वास्ते संतोषप्रद वातावरण का निर्माण कर सकेंगे।
    आज विश्व में प्रबल विचार-मंथन रो रहा है और मनोवृत्तियों पर प्रश्न-चिह्न लगाए जा रहे हैं। प्रगति के बावजूद आज के साथ या अपने आप में शांति के साथ रह  सकना कठिन हो रहा है। और उसे अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, हालांकि यह एक भिन्न ढंग का और भिन्न स्तर का संघर्ष है। आज खतरा असभ्य एवं सबल आक्रांताओं की ओर से नहीं है बल्कि उन परिपार्श्विक प्रभावों से है, जो मनुष्य ने अपने ही सुख-साधनों को विकसित करने के क्रम में उत्पन्न किए हैं, ये प्रभाव हैं अलगाव का अहसास, तनाव पैदा करने वाली परिस्थितियाँ, प्रदूषण तथा प्राकृतिक साधनों का विचारहीन दोहन यह अहसास, धीरे-धीरे किंतु निश्चयात्मक रूप में प्रगतिशील लोगों के विचारों का अंग बनता जा रहा है और विश्वव्यापी चर्चा का विषय बन गया है। लेकिन ऐसे लोगों और विचारों की प्राय: उनके द्वारा खिल्ली उड़ाई जाती है जो उन चीजों के निर्माण में लगे हैं जिनका प्रभाव कालांतर में हानिकर हो सकता है। और उन लोगों द्वारा भी, जो वायु या जल के प्रदूषण को बचाने के लिए अपने कारखानों को नए सिरे से जमाने की चिंता नहीं करना चाहते। यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमने औद्योगीकरण का सिलसिला एक ऐसे समय में शुरू किया है जबकि वह पहले की अपेक्षा कहीं ज्यादा खर्चीला और जटिल है।
 

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