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BUDDHA ACADEMY TIKAMGARH (MP) || ☺ || CPCT & MP High Court

created Dec 6th, 12:19 by Anuj Gupta 1610


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कहते हैं जब सारे दरवाजे बंद हो जाते हैं तो भगवान एक खिड़की खोल देता हैं। लेकिन अकसर हम बंद हुए दरवाजे की ओर इतनी देर तक देखते रह जाते हैं कि खुली हुई खिडकी की ओर हमारी निगाह भी नहीं जाती। ऐसी परिस्थिति में जो अपनी इच्‍छाशक्ति से असंभव को संभव बना देते है, वो अमर हो जाते हैं। कहा संकल्‍प वह महान शक्ति हैं जो मानव की आंतरिक शक्तियों को विकसित कर प्रगति पथ पर सफलता की इबारत लिखती है। अनगिनत लोगों की प्ररणा और नारी जाति का गौरव मिस हेलन केलर हैं जो शरीर से अपंग पर मन से समर्थ महिला थीं। उनके प्रभावशाली इरादों नें नई प्रेरणा शक्ति को जन्‍म दिया। 27 जून 1880 को जन्‍म लेने वाली ये बालिका 6 महिने में घुटनो के बल चलने लगी और एक वर्ष की होने पर बोलने लगी। जब 19 माह की हुई तो साधारण से बुखार ने उसकी खुशहाल जिंदगी पर ग्रहण लगा दिया। बुखार तो ठीक हो गया किन्‍तु उसने हेलन केलर को दृष्टिहीन तथा बधिर बना दिया। सुन सकने की स्थिति में बोलना भी असंभव हो जाता है। माता पिता बेटी की ऐसी हालत देखकर अत्‍यधिक दुखी हो गये। हेलन का बचपन कठिन दौर से गुजरने लगा। किसी को आशा भी थी कि इन मुश्किलों का कोई उपाय भी हो सकता है। एक दिन हेलन की माता समाचार पत्र पढ़ रहीं थीं। तभी उनकी निगाह बोस्‍टन की परकिन्‍स संस्‍था के विवरण पर पड़ी। उसको पढ़ते ही उनके चेहरे पर प्रसन्‍नता की एक लहर दौड़ गई और उन्‍होंने अपनी पुत्री हेलन को घर आकर पढ़ाने लगी। यही से हेलन केलन की जिंदगी में परिवर्तन शुरू हुआ। केलर की अध्‍यापिका सुलीवान बहुत मश्किलों से उन्‍हें वर्णमाला का ज्ञान दिया। एक एक अक्षर को केलर कई घंटो दोहराती थीं तब कहीं जाकर वे याद होते थे। धीरे-धीरे वे बोलने का भी अभ्‍यास करने लगीं जिसमें उन्‍हें आंशिक सफलता प्राप्‍त हुई। इसी तरह कठिन परिश्रम के बल पर उन्‍होंने लैटिन, फ्रेंच, और जर्मन भाषा का ज्ञान प्राप्‍त किया। 8 वर्षों के घोर परिश्रम से उन्‍होंने स्‍नातक की डिग्री प्राप्‍त कर ली थी। अब उन्‍हें संसार में लोग जानने लगे थे और बधिर होते हुए भी संगीत की धुन सुन सकती थीं। यह ही नहीं, आत्‍मा के प्रकाश से वे सब देख भी सकती थी। सुलीवान केवल उनकी शिक्षका ही नही बल्कि उनकी जीवन संगनी जैसी थीं। उनकी सहायता से ही हेलन केलर ने टालस्‍टाय, नीतेश, रविन्‍द्रनाथ टैगोर और अरस्‍तू जैसे विचारकों के साहित्‍य को पढ़ा। यह ही नही, उनकी लिखी आत्‍मकथा संसार की 50 भाषाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं।

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