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BUDDHA ACADEMY TIKAMGARH-(MP):- SONU AHIRWAR

created Jan 11th, 05:10 by Sonu Ahirwar


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अयोध्‍या मामला सिर्फ न्‍यायपालिका ही नहीं जनता के विवेक की भी परीक्षा है। इसलिए सुनवाई टलने पर तो खुशी मनाने की जरूरत है और ही दुखी होने की। अगर भारत के राजनेताओं में समन्‍वय और समाधान की बुद्धि होती और भारत के धर्माचार्यों में सद्भाव की समझ होती तो तो यह मामला इतने लंबे समय तक खिंचता और ही इस पर इतना विवाद और तनाव होता। सुनवाई शुरू होने के साथ मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने उचित आपत्ति उठाई और अच्‍छा हुआ कि न्‍यायमूर्ति यूयू ललित ने उस इशारे को समझकर अपने को उस संविधान पीठ से अलग कर लिया। धवन ने याद दिलाया था कि जास्टिस यूयू ललित इससे पहले बाबरी मस्जिद विध्‍वंस के आरोपी कल्‍याण सिंह के वकील रह चुके थे। अब 29 जनवरी को इस मामले की अगली सुनवाई होगी और तब तक नई बेंच बन जाएगी। बेंच के साथ एक और आपत्ति ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से जुड़े जफरयाब जिलानी ने उसमें किसी मुस्लिम जज के होने की उठाई थी लेकिन, उसे बोर्ड के पदाधिकारियों ने खारिज कर कहा था कि उन्‍हें न्‍यायपालिका पर पूरा विश्‍वास है। इसलिए पीठ के सदस्‍यों के बारे में अब कोई आपत्ति नहीं आनी चाहिए। एक और आपत्ति हिंदू महासभा की ओर से आई है। अदालत में हजारों पेज के दस्‍तावेजों का अनुवाद प्रस्‍तुत किया गया है। महासभा चाहती है कि अदालत देख ले कि अनुवाद ठीक से हुए हैं या नहीं। हजारों पेज के दस्‍तावेज अरबी, फारसी, संस्‍कृत, उर्दू और गुरुमुखी में है। मुकदमा शुरू होने में जो देरी हुई है उसमें इनके अनुवाद का समय काफी कुछ जिम्‍मेदार है। निश्चित तौर पर यह इस देश का सबसे बडा मुकदमा है और संयोग से इसे भगवान राम और लोकतांत्रिक राजनीति से जोड़कर उसमें उलझन और चुनौती पैदा कर दी गई है। फैसला जो भी हो इससे राम की स्थिति पर नहीं उनके भक्‍तों की स्थिति पर ही फर्क पड़ेगा। इस मामले की सुनवाई को जिस तरह 2019 के चुनाव से जोड़ दिया गया है वह भी दुर्भाग्‍यपूर्ण है। इसलिए अगर इसमें देरी उचित नहीं है तो उल्‍दबाजी भी सही नहीं है। इस मामले से जुड़े संवैधानिक मूल्‍य सुप्रीम कोर्ट के हाथ में हैं और कोर्ट न्‍यायिक विवेक के सहारे। आशा की जानी चाहिए कि जो भी निर्णय आएगा उसे जनता सिर माथे पर रखेगी।  

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