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Siddharth Shrivastava Jatara (MP) CPCT & MP High Court Typing

created Jan 11th, 05:36 by Siddharth Shrivastava


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परिवार में घर-गृहस्‍थी की आवश्‍यकताऍं पूरी करने और निर्वाहोपयोगी उपार्जन का कार्य पुरुष को सॉंभालना पड़ता है। इस कारण उसका व्‍यक्तित्‍व और कार्यक्षेत्र घर-परिवार के साथ साथ बाहर भी बँट जाता है। संभवत/ यही एकमात्र कारण है कि पुरुष को परिवार में प्रमुख और मुखिया की प्रतिष्‍ठा मिली हो, लेकिन परिवार के संदर्भ में यह भी विचारणीय है कि उसका प्रमुख अंग मुखिया ही नहीं है; एक गृहिणी भी है, जो परिवार की आंतरिक व्‍यवस्‍था को सँभालती है, घर के सभी सदस्‍यों की आवश्‍यकता की देख-भाल करती है। उसे भी समुचित प्रतिष्‍ठा और महत्‍व दिया जाना चाहिए, ताकि गृहस्‍थरूपी गाड़ी के दोनों पहिये एक धुरी पर समानांतर रूप से टिके और चलते रहें, लेकिन ऐसा होता नहीं है। पिछली शताब्दियों में भारतीय परिवारों का ढॉंचा कुछ इस प्रकार का बन गया है कि उसमें स्‍त्री को गौण और पुरुष को प्रधान माना जाने लगा।  
स्‍त्री-पुरुष की असमान प्रतिष्‍ठा के कारण गृहस्‍थी की गाड़ी किसी प्रकार चलती भले ही रहे, पर वह चलती कम, घिसटती ही जाती है लेकिन एक स्‍त्री ही परिवार की आंतरिक व्‍यवस्‍था को सॅभालती है।   
मानव शरीरधारी के लिए स्‍वास्‍थ्‍य रक्षा की समस्‍या सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण है। यद्यपि अनेक अनभिज्ञ व्‍यक्ति धन को ही सबसे बड़ी चीज बतलाते हैं। अन्‍य लोग बढि़या भोज्‍य सामग्री, चमक-दमक की पोशाक, सुंदर महल, गाड़ी, मोटर आदि वाहनों को सुख का आधार कहते हैं, पर थोड़ा-सा ही ि‍विचार करने पर मालूम हो जाता है कि ये सब चीजें उत्‍तम स्‍वास्‍थ्‍य होन पर ही उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं। दुनिया में ऐसे सैकड़ों व्‍यक्ति मिल सकते हैं, ि‍जिनके पास लाखों या करोड़ों की संख्‍या में धन भी मौजूद है और सब प्रकार की सुख-सामग्री भी जिनको प्राप्‍त है पर जो सदा रोगी और दु:खी ही बने रहते हैं। अनेक व्‍यक्ति तो यहॉं तक दु:खी होते हैं कि आत्‍मघात करके दु:खों से छुटकारा पाने की चेष्‍ठा करते हैं।  

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