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BEST - CPCT & Typing Classes Joura

created Jan 11th, 08:36 by Abhi Jain


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शेरशाह के शासनकाल की सर्वप्रमुख विशेषता उसके द्वारा कर-प्रणाली में सुधार किया जाना थी। शेरशाह ने अपनी युवावस्था में जागीर का प्रबन्ध करते समय किसानों की समस्या को समझा था। वह किसानों का आदर करता तथा किसानों का किसी प्रकार से उत्पीड़न अथवा फसल को हानि पहुंचाना उसे पसन्द था, चाहे वह उसके दुश्मन के राज्य की ही क्यों हो। अतः शासक बनने के पश्चात् भूमि-व्यवस्था को सुधारने के लिए अनेक कार्य किये। उसने अपने विश्वसनीय अधिकारी अहमद खां के निरीक्षण में राज्य की भूमि का वास्तविक नाप कराया। शेरशाह से पहले भूमि नापने की प्रथा नहीं थी। तत्पश्चात् नापी हुई भूमि को, बीघे को इकाई मानते हुए, विभाजित किया गया तथा प्रत्येक किसान के साथ ‘इकरारनामा’ किया जाता था, जिसे ‘कबूलियत’ कहते थे। प्रत्येक किसान के ‘कबूलियत’ पर लगान की दर लिखी रहती थी। लगान निश्चित करने के लिए भूमि का वर्गीकरण तीन भागों में किया गया था - उत्तम, मध्यम निम्न। लगान निश्चित करते समय अधिकारियों को उदारता वसूल करते समय कठोर नीति का पालन करने के आदेश दिये गये थे। किसानो को भूमि  कर नकद अथवा अनाज दोनों रूपों में देने की सुविधा थी, किन्तु नकद लगान लेने को प्राथमिकता दी जाती थी। उसने लगान वसूल करने वाले अधिकारियों को कड़े निर्देश दिए थे कि लगान निश्चित करते समय कृषक के साथ पूर्ण नरमी की जाय, किन्तु लगान कठोरता से वसूल किया जाता था। सेना के गमन के समय यदि फसल को नुकसान होता था तो इसका मुआवजा दिया जाता था।

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