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BUDDHA ACADEMY TIKAMGARH (MP) || ☺ || CPCT_Admission_Open

created Monday April 15, 07:20 by Subodh Khare


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यदि इस देश के भ्रष्‍टाचार को रावण मान लिया जाएतो सवाल है कि उसकी नाभिका अमृत कुंड कहां हैं। पिछले ढाई दशकों का अनुभव बताता है कि वह अमृत कुंड सांसद क्षेत्र विकास निधि है। घोटाला महा घोटाले राष्‍ट्र राज्‍य की काया को कमजोर करते हैं, लेकिन सांसद निधि घोटाला तो आत्‍मा को प्रभावित कर रहा है। आम धारणा है कि सांसद फंड की चालीस प्रतिशत राशि वह ऑफिस ले लेता है जहां से यह फंड खर्च किया जाता है। बीस प्रतिशत में से ठेकेदार और जन प्रतिनिधि के बीच बंटता है यानी फंड का चालीस प्रतिशत ही जमीन पर लग पाता है। सांसद निधि आवंटित करने के लिए रिश्‍वत लेने के आरोप में उत्‍तर प्रदेश के एक सांसद की 2007 में सदस्‍यता जा चुकी है। उनकी सदस्‍यता इसलिए गई, क्‍योंकि वह स्टिंग आपरेशन में फंस गए थे। दरअसल जो व्‍यक्ति पहली बार सांसद बनता है और जिसे ऊपरी आय से गुरेज नहीं है, उसकी आदत यहीं से बिगड़नी शुरू हो जाती है। यही बात अखिल भारतीय सेवाओं के अफसरों पर भी लागू होती है।
    सन् 1980 के बाद से वन संरक्षण अधिनियम के नाम पर पर्यावरण और वन मंत्रालय ने ढेड करोड़ हेक्‍टेयर से अधिक भूमि को गैर वनीय गतिविधियों के लिए स्‍वाहा कर दिया है। इस कानून के दायरे में होने वाले वन-विनाश ने अनेक आदिवासियों और वनवासियों को उनकी जड़ों से उखाड़ दिया है। जिन निगमों को वन की भूमि सौंपी गई है, उन्‍होंने इस भूमि का उपयोग करके करोड़ों रुपये कमा लिये हैं। क्षतिपूर्ति के नाम पर वन विभाग को भी पर्याप्‍त राशि मिल चुकी है। हानि हुई है, तो उनको जो गरीब हैं, और वनोपजों के जरिए अपनी जीविका चला रहे थे। इन सबके बीच यह प्रश्‍न उठना स्‍वाभाविक है कि आखिर वनों के संरक्षण के लिए बनाए गए अधिनियम का इस कदर दुरुपयोग क्‍यों किया जा रहा है।
     

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