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BUDDHA ACADEMY TIKAMGARH (MP) || ☺ || CPCT_Admission_Open

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प्रकृति के अंदर वायु, पानी, मृदा, पेड-पौधे, पशु-पक्षी, नदियां, सरोवर, झरने, समुद्र, जंगल, पहाड, खनिज आदि और जाने कितने प्राकृतिक संसाधन आते हैं। इन सभी से हमें सांस लेने के लिए शुद्ध हवा, पीने के लिए पानी, भोजन आदि जो जीवन के लिए नितान्‍त आवश्‍यक हैं उपलब्‍ध होते हैं। प्रकृति से हमें जीवन जीने की उमंग मिलती है। बसंत देख कर दिल खुश हो जाता है, सावन में रिमझिम बरसात मन को मोह लेती है। प्रकृति हमें शारीरिक सुख-सुविधा के साथ-साथ मानसिक सुख भी प्रदान करती है पर हमारे पास प्रकृति को देने के लिए कोई वस्‍तु नहीं है। यदि कुछ है तो वह इतना है, कि हम इसका संरक्षण कर सकें। सूर्य की पहली किरण से लेकर चांद  की चांदनी तक, खुले मैदानों, बुग्‍यालों से लेकर जंगल और पहाडों तक, नदी के कल-कल मधुर संगीत से लेकर समुद्र में उठती लहरों, पेड पर बैठी चिडिया की चहचहाहट जो भी हमारे आसपास उपलब्‍ध प्राकृतिक संसाधन है हमें सबका अनुभव करना चाहिये। क्‍योंकि जब तक हमें इसके महत्‍व का बोध नहीं होगा और हम इसके सौंदर्य की सराहना करना नहीं सीखेंगे तब तक हमारे लिए यह महत्‍व का विषय नहीं हो सकता। किसी चित्रकार, कवि, लेखक और कलाकारों के भाव त‍भी जागृत होते हैं जब वह प्रकृति की गोद में शांत वातावरण में कल्‍पना करता है, तभी वह उसे कागज पर उतारता है। इसके बिना तो जीवन में रंग भी नहीं है। जब इंसान मशीनी जीवन जीते-जीते ऊब जाता है तो प्रकृति की गोद में जाकर सुकून की सांस लेना चाहता है। आजकल के युग में मनुष्‍य प्राकृतिक वस्‍तुओं की ओर ज्‍यादा आकर्षित हो रहा है और वस्‍तुएं खरीदते समय भी वह प्राकृतिक वस्‍तुओं या प्राकृतिक तत्‍वों से बनी वस्‍तुओं को ही महत्‍व देता है। जब हम प्राकृतिक उत्‍पादों को इतना महत्‍व है देते हैं तो प्रकृति को क्‍यों नहीं, आखिर ये सब वस्‍तुएं तभी तक उपलब्‍ध हैं जब तक यह प्रकृति हैं। हम प्रकृति से चाहते तो बहुत कुछ हैं लेकिन अपनी कीमत पर जिस तेजी से हम पेड काट कर वनों को कम करके उत्‍पादों का निर्माण कर रहे हैं उतनी तेजी से पौधों का रोपण नहीं हो रहा है। हमें पीने के लिए स्‍वच्‍छ जल चाहिये लेकिन कल-कारखानों का सारा जहरीला पानी हम नदियों में ही बहाते हैं। खाने के लिए हमें रसायन मुक्‍त फल-फूल और भोजन चाहिये लेकिन रसायनों का प्रयोग बंद नहीं करते। जैसा व्‍यवहार हम प्रकृति के साथ करेंगे वैसा ही वह हमारे साथ करेगी। बेमौसमी बरसात, बाढ, सूखा, मौसम परिवर्तन, भू-स्‍खलन, सूखते जंगल, बंजर भूमि इन सब परिणामों के लिए हमें तैयार रहना चाहिये। यदि ऐसा ही रहा तो दिन प्रतिदिन यह प्रकृति धीरे-धीरे लुप्‍त होती जायेगी इसलिए हमें प्रयत्‍न करना चाहिये कि हम प्रकृति का संतुलन बिना बिगाडे इसका लाभ उठा सकें।

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