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बंसोड टायपिंग इंस्‍टीट्यूट गुलाबरा, छिन्‍दवाड़ा मो.न.8982805777 सीपीसीटी न्‍यू बैच प्रांरभ

created Dec 2nd, 13:58 by sachin bansod


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हमारे समाज में दो प्रकार की मान्‍यताएं प्रचलित हैं- पहली भाग्‍यतवाद तथा दूसरी पुरुषार्थवाद। भाग्‍यवादियों का विचार है कि किस्‍मत में जो कुछ लिखा है वह सब मिल जाएगा। ऐसे व्‍यक्ति तो कोई काम करते हैं और ही किसी काम के प्रति उनमें कोई उत्साह जागता है। दूसरी श्रेणी के व्‍यक्ति पुरुषार्थवादी होते हैं जिनका ध्‍येय  है प्रमाद को छोड़ कर्मरत रहना। कर्म करते समय वे इस बात की परवाह नहीं करते कि देखने वाले लोग उनके बारे में क्‍या कह रहे हैं। वे स्‍वयं लक्ष्‍य निर्धारित करते हैं और स्‍वयं उसकी प्राप्ति हेतु प्रयासरत हो जाते हैं। इतिहास इस बात का साक्षी है। कि जिन लोगों ने अपने जीवन में उन्‍नति की है उन्‍होंने उद्यम के बल पर ही की है। संसार में जितनी प्रकार की आर्थिक, औद्योगिक, व्‍यावसायिक उन्‍नतियां हुई हैं उसके पीछे एक ही कहानी है निरंतर प्रयास और सफलता। पुरुषार्थ सदैव भाग्‍य से अधिक शक्तिशाली है। महाराणा प्रताप ने पुरुषार्थ के बल पर दोबारा अपना खोया हुआ राज्‍य प्राप्‍त किया था। कालिदास घोर परिश्रम से एक मूर्ख से विद्वान बने साधनहीन लाल बहादुर शास्‍त्री देश के प्रधानमंत्री बने। अंतरिक्ष में मानव की जीत, चांद पर उसका घूम आना किस बात का प्रतीक है? भाग्‍य या पुरुषार्थ? विजय सर्वत्र कर्मवीर की ही होती है क्‍योंकि सकल पदारथ हैं जग माहीं, कर्महीन नर पावत नाहीं। उठो! चलो! इन संकरी-कटीली रातों के बीच तुम्‍हारा हाथ पकड़कर रास्‍ता दिखाने-बताने के लिए कोई देवदूत आने वाला नहीं है।

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