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BUDDHA ACADEMY TIKAMGARH (MP) || ☺ || CPCT_Admission_Open

created Dec 3rd, 06:13 by ddayal2004


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पेट्रोल के साथ मिलाने के लिए एथनॉल की उपलब्‍धता और आवश्‍यकता के बीच भारी अंतर को देखते हुए इसमें दो राय नहींक कि इसका उत्‍पादन बढ़ाने की आवश्‍यकता है। परंतु सरकार इस लक्ष्‍य को हासिल करने के लिए जो प्रयास कर रही है वे पर्याप्‍त नहीं प्रतीत होते। इनमें सबसे बहसतलब है एथनॉल निर्माताओं द्वारा गन्‍ने के रस को सीधे अल्‍कोहल में बदलना। इसके अलावा वे अधिशेष चीनी और खाद्यान्‍न मसलन गेहूं, चावल और मक्‍के को भी इसके लिए प्रयोग में लाते हैं। इतना ही नहीं सरकार ने इन कच्‍चे मालों के प्रयोग को बढ़ावा देने वाला कदम के रूप में इनसे बनने वाले एथनॉल की अपेक्षाकृत ऊंची कीमत तय की है।
    ऐसे में किसान गन्‍ने की खेती और चीनी मिलें गन्‍ने की खरीद, चीनी बनाने के बजाय इस जैव ईंधन के लिए करेगी। चूंकि गन्‍ना, गेहूं और चावल के उत्‍पादन में खूब पानी लगता है इसलिए कहा जा सकता है कि जैव ईंधन उत्‍पादन में इनका इस्‍तेमाल पर्यावरण के लिए किसी त्रासदी को आमंत्रण देने के समान है। इनके उत्‍पादन में लगने वाले पानी की लागत को केवल आर्थिक संदर्भ में नहीं आंका जा सकता। इसकी सामाजिक कीमत, पेट्रोल में एथनॉल मिलाने से होने वाली आर्थिक बचत से कहीं अधिक हो सकती है।
    इतना ही नहीं भारत जैसे देश में जहां बुनियादी ढांचे, उद्योग धंधों और अन्‍य उद्देश्‍यों के लिए भी जमीन मुश्किल से मिलती है वहां जैव ईंधन फसल के उत्‍पादन में इसका इस्‍तेमाल समझदारी भरा नहीं होगा। जहां तक खाद्यान्‍न की बात है, फिलहाल ऐसा लग सकता है कि अधिशेष अन्‍न को आसानी से जैव ईंधन बनाने के लिए इस्‍तेमाल किया जा सकता है लेकिन देश में व्‍याप्‍त कुपोषण और भूख को देखते हुए इसे उचित ठहराना मुश्किल होगा। हकीकत में कई भूसंपदा समृद्ध और औद्योगिक देश, जो गैसोलीन में फसल से बनने वाला जैव ईंधन मिलाते हैं, वे भी अपनी नीतियों की समीक्षा कर रहे हैं। अध्‍ययन बताते हैं कि इससे फसल बुआई के तरीके बदल गए हैं और खाद्यान्‍न कीमतें बढ़ी हैं। जैव ईंधन वाली फसल उगाने के लिए वनों की कटाई की सलाह को भी पर्यावरणविद चुनौती दे रहे हैं। गौरतलब है कि ब्राजील तथा कुछ अन्‍य देश ऐसा कर रहे हैं।
    एक अन्‍य बात जिस पर ध्‍यान देना जरूरी है वह यह कि भारत में गन्‍ने तथा खाद्यान्‍न से इतर तरीकों से भी एथनॉल तैयार करने की काफी संभावना मौजूद है जिसका पूरा दोहन होना अभी बाकी है। वर्ष 2009 की राष्‍ट्रीय जैव ईंधन नीति जिसे 2018 में संशोधित किया गया, वहां ग्रामीण और शहरी कचरे, सेलूलोसी और लिंगो सेलुलोसी बायोमास तथा गेहूं और धान के अवशेषों से एथनॉल का कच्‍चा माल तैयार किया जा सकता है।  

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