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प्रतिस्‍पर्धी खेलों में लीग व्‍यवस्‍था होती है। ये लीग उच्‍च, मध्‍य, निम्‍न, वरिष्‍ठ और कनिष्‍ठ समेत तमाम वर्गों में विभाजित होती हैं। किसी प्रतिभागी का कद देखकर ही यह निर्णय होता है कि वह किस लीग में खेलेगा या खेलेगी। जो खिलाड़ी निचले स्‍तर की लीग में युवतर खिलाडियों के साथ खेलता है वह अपना ही कद कमजोर करता है। देश की राजनीति पर भी इस बात को लागू किया जा सकता है। खासतौर पर भारतीय जनता पार्टी सरकार छात्रों के विरोध प्रदर्शन से जिस तरह निपट रही है उसे देखते हुए ऐसा किया जा सकता है।  
    इसे समझने का एक सामान्‍य तरीका वह है जो हम पहलवान से अभिनेता बने दारा सिंह से सीख सकते हैं। दारा सिंह खुद को कुश्‍ती की चुनौती देने वालों से कहते थे कि पहले वह उनके भाई रंधावा को पराजित करे तभी वह उनसे कुश्‍ती लड़ पाएगा। मैंने उनसे सवाल किया कि वह ऐसा क्‍यों करते हैं तो उन्‍होंने जवाब दिया कि कोई भी लल्‍लू पंजू यह डींग हांकना चाहेगा कि वह दारा सिंह के साथ लड़ चुका है। मैं उन्‍हें खुश करने के लिए अपना कद क्‍यों छोटा करूं।
    वापस राजनीति की बात करते हैं। भाजपा की ताकतवर सरकार बीते एक महीने से यही कर रही है। वरिष्‍ठ, शक्तिशाली स्‍त्री और पुरुष, बच्‍चों से लड़ रहे हैं। उनकी नीतियों के विरोध में देश भर के शैक्षणिक परिसरों में आग भड़ी हुई है। भाजपा जहां सत्‍ता में है वहां इसका मुकाबला वह पूरी शक्ति से कर रही है। इंटरनेट और संचार सीमित किया जा रहा है और उत्‍तर प्रदेश में तो सामूहिक जुर्माना तक लगाया गया है। यदि इतने बहुमत से जीतकर आई सरकार छात्रों की बात सुनने के बजाय उनसे लड़ने लगती है तो तीन घटनाएं लाजिमी तौर पर घटती हैं।

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