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बंसोड टायपिंग इन्‍स्‍टीट्यूट शॉप नं. 42 आनंद हॉस्टिपटल के सामने, संचालक- सचिन बंसोड मो.नं.

created Jan 14th, 12:36 by Vikram Thakre


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नीति आयोग की एक ताजा रिपोर्ट बताती है कि देश में 22 से 25 राज्‍यों में गरीबी और भूखमरी तेजी से बढ़ी है। प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल लांसेट ने भी एक हालिया रिपोर्ट में भारत में सुपोषण अभियान की विफलता का जिक्र किया है। असल में गरीबी की कोख से ही कुपोषण जन्‍म लेता है और यह एक त्रसदपूर्ण तथ्‍य है कि भारत में 72 वर्षो से गरीबी उन्‍मूलन के अधिकतर प्रकल्‍प जमीनी स्‍तर पर भ्रष्‍टाचार के चलते असफल साबित हुए हैं। देश में 68 फीसद कुपोषण से ग्रस्‍त बच्‍चे पांच साल की आयु तक आते आते मौत के मुंह में समा रहे हैं। सबसे ज्‍यादा बुरे हालात बिहार, मध्‍यप्रदेश, उत्‍तर प्रदेश, राजस्थान, असम, छत्‍तीसगढ़ और ओडि़शा जैसे राज्‍यों की है। संयोग से नीति आयोग की रिपोर्ट में जिस गरीबी और भूखमरी की चर्चा की गई है, वे राज्‍य भी यही हैं। इन राज्‍यों में लगभग 20 करोड़ लोगों की भयावह गरीबी की श्रेणी में पहचान की गई है। यानी समाजवादी विकास मॉडल के दौर में जिन बीमारू राज्‍यों को लेकर भारत की चिंताएं प्रबल थीं, नवउदारवाद और वैश्‍वीकरण के दौर में यह आज भी कमोबेश उसी अनुपात में हमारे लिए चुनौती बनी हुई है। सवाल यह है कि लाखों करोड़ रुपये खर्चने के बावजूद भारत गरीबी और भूख के विरुद्ध लड़ाई में क्‍यों कामयाब नहीं हो रहा है? असल में नीति निर्माण और जमीनी स्‍तर पर क्रियान्‍वयन का सरकारी मॉडल भारत की विविधता और सामाज के साथ तादातम्‍य स्‍थापित करने में सफल नहीं है, क्‍योंकि हर सरकारी मिशन भयंकर भ्रष्‍टाचार की चपेट में है। नजीर के तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आठ मार्च 2018 को राष्‍ट्रीय पोषण मिशन राजस्‍थान से आरंभ किया था। 9,046 करोड़ के बजट प्राविधान वाले इस पोषण मिशन से 718 जिलों के दस करोड़ चिन्हित लोगों को मूलत: गरीबी और कुपोषण से 2020 तक बाहर लाया जाना था। केंद्र सरकार के ताजा आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि सरकार द्वारा मार्च 2019 तक जारी 4,238 करोड़ में से महज 1,283 करोड़ की राशि ही राज्‍य खर्च कर पाए हैं। पोषण मिशन के लिए जिस मिशनरी मानसिकता की आवश्‍यकता होती है उसे नोडल एजेंसियों में लागू करने या जनभागीदारी की दिशा में कोई काम नहीं कर पाई हैं। अन्‍य सरकारी योजनाओं की तरह इस मिशन में भी अफसरों ने ऐसे कड़़े नियम कायदे बनाए कि आबंटित राशि खातों में ही ब्‍याज बढ़ाती रही। पोषण मिशन में व्‍यवहार परिवर्तन और मौजूदा सरकारी महकमों के मध्‍य समेकन का समन्‍वय और समीक्षा के बुनियादी काम होने थे। जमीनी स्‍तर पर ये काम इसलिए नहीं हो पाए, क्‍योंकि क्रियान्‍वयन एजेंसियों की लापरवाही और अकर्मण्‍यता  केंद्रित कार्य संस्‍कृति में कोई बदलाव लाने को तैयार नही है। कुपोषण जैसे दंश को मिटाया जाना इसलिए संभव नहीं है क्‍योंकि यह एक सामाजिक समस्‍या भी है।

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