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BANSOD TYPING INSTITUTE GULABRA CHHINDWARA M.P. MOB. NO. 8982805777

created Feb 14th, 09:20 by bansod typing


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निजीकरण ने रोजी-रोजगार का चरित्र बदल डाला। आज के युवा उनकी संतानें हैं, जिन्‍होंने तेज बदलाव वाले उस दौर की चुनौतियां सीधे झेली हैं। उन्‍होंने महसूस कर लिया कि नए दौर में जगह बनानी है तो अपने बच्‍चों को उसके लिए तैयार करना होगा। उन्‍होंने खुद चाहे जैसी भी शिक्षा पाई हो, अपने बच्‍चों के एजुकेशन पर भारी खर्च किया। अपने अनुभवों से वे भांप चुके थे कि भविष्‍य प्राइवेट सेक्‍टर का ही है, लिहाजा उन्‍होंने अपने बच्‍चों को अकादमिक की बजाय तकनीकी और व्‍यावसायिक शिक्षा दिलाने पर जोर दिया। इसका फायदा यह हुआ कि उनके बच्‍चों को प्राइवेट सेक्‍टर की आकर्षक नौकरियां मिल सकीं। बाजार में कई नई तरह की नौकरियां आईं और उदारीकरण ने भारत में उद्यमिता की गुंजाइश भी पैदा की। पहले की तरह अब कारोबार पर कुछ चुनिंदा घरानों का एकाधिकार नहीं रहा। सबसे बड़ी बात यह है कि सामाजिक मान्‍यताएं भी बदलीं और कारोबार करने को खराब नजरों से देखने की मानसिकता समाप्‍त हुई। कई नए सेक्‍टर खुलने से उद्यमी युवाओं के लिए कारोबार करके पैसे कमाना आसान हुआ। इसके लिए ऋण और सरकारी मदद अब पहले से ज्‍यादा उपलब्‍ध होने लगी है। कई युवा बगैर नौकरी किए फ्रीलांसिंग से पैसे कमा रहे हैं। वे वेब ऐंड मोबाइल डिवेलपमेंट, वेब डिजाइनिंग, डेटा एंट्री, इंटरनेट रिसर्च, अकाउंटिंग और कंसल्‍टेंसी जैसे क्षेत्रों में सक्रिय हैं। बहरहाल, चीजें अभी शहरी मिडल क्‍लास के लिए ही ज्‍यादा बदली हैं। कोशिश होनी चाहिए कि यह आशावाद देश के हर वर्ग के युवाओं में देखने को मिले। भारत के यूथ मानते हैं कि उनका जीवन उनके पैरंटस से बेहतर है, उन्‍हें अपने अभिभावकों से कहीं अच्‍छी शिक्षा मिली है और उनका काम-धंधा भी पिछली पीढ़ी से बढि़या जा रहा है। उनके पास पैसे कमाने के अवसर भी ज्‍यादा हैं, लेकिन यह स्थिति भारत के अलावा कुछ गिने-चुने देशों में ही है। चीन, सऊदी अरब, फिलीपींस और मलयेशिया के युवा भारत के युवाओं की ही तरह सोचते हैं लेकिन दुनिया के बाकी देशों के नौजवान ऐसा नहीं सोचते। विश्‍व आर्थिक फोरम (डब्‍ल्‍यूईएफ) और इप्‍सॉस के एक सर्वेक्षण के अनुसार अमेरिका, ब्रिटेन, और जर्मनी के यूथ मानते हैं कि उनके अभिभावकों के पास ज्‍यादा आर्थिक अवसर उपलब्‍ध थे और वे अपराधों और बाकी संकटों से भी नई पीढ़ी के मुकाबले ज्‍यादा सुरक्षित थे। आज युवा ज्‍यादा सजग ज्‍यादा कर्मठ, ज्‍यादा सुविधा भोगी और धार्मिक सांस्‍कृतिक मूल्‍यो से विमुख हो रहा है ,फास्‍ट जीवन जीने का आदि हो गया है. यह सर्वे इन देशों के 22,285 शहरी युवाओं के बीच किया गया। हर सर्वेक्षण की अपनी सीमा होती है लेकिन उससे बदलते ट्रेंड की एक झलक तो मिलती ही है। भारत के संदर्भ में देखें तो यह सर्वेक्षण इस बात का संकेत है कि पिछले कुछेक दशकों के बदलावों का असर अब दिखने लगा है। नब्‍बे के बाद देश के अर्थतंत्र में व्‍यापक परिवर्तन हुए। उदारीकरण की नीति के तहत देश का बाजार पूरी दुनिया के लिए खुला और भारत में विदेशी पूंजी निवेश के लिए जमीन तैयार हुई।

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