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BUDDHA ACADEMY TIKAMGARH (MP) || ☺ || ༺•|✤आपकी सफलता हमारा ध्‍येय✤|•༻

created Apr 14th, 04:56 by Vivek Sen


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गांव में महेश और उसका परिवार रहता था। परिवार छोटा होने के बावजूद खाने पीने के लाले पड़े हुए थे। पति कमाने की बजाय सिर्फ बड़ी-बड़ी डींगे हॉकने में लगा रहता था। वह रोज शाम को नदी के किनारे बैठ कर बांसुरी बजाया करता। इसके सिवा उसके पास दूसरा कोई काम नहीं था। महेश एक नंबर का निठल्‍ला, कामचोर और आलसी था। हालांकि बड़ी-बड़ी ज्ञानवर्धक बातें करना उसकी फितरत थी। पत्‍नी के बार-बार समझाने पर भी नहीं समझता, बल्कि उल्‍टे उसी से झगड़ता जिसके कारण कभी पत्‍नी से उसका बेइन्‍तेहां प्‍यार आज मनमुटाव में परिवर्तित हो चुका था। महेश के किसी काम में मन लगने की सबसे बड़ी वजह ये थी कि उसे हर काम छोटा लगता था। कोई भी काम उसके लायक नहीं था। परंतु वह जब चाह लेगा, तब सब हो जाएगा ऐसा उसका मानना था।
    एक दिन शाम को नदी के किनारे बैठे-बैठे बांसुरी वादन कर रहा था तभी अचानक उसकी बांसुरी की धुन से मंत्र-मुग्‍ध हुई एक जलपरी वहां प्रकट हुई वह वहीं खड़ी उसके बांसुरी की धुन को चुपचाप सुनती रही बांसुरी में पूरी तरह डूबे महेश को इस बात की खबर ही नहीं थी कि कोई उसके सुन रहा है।
    सामने खड़ी जलपरी मुस्‍कुराए जा रही थी। वह उसकी इस कला पर काफी प्रसन्‍न थी। अचानक जलपरी पर उसकी जैसे ही निगाहें पड़ी। वह थोड़ा डर गया इस प्रकार की रंग, रूप और आकृति वाली स्‍त्री उसने पहली बार देखी थी। जो नदी के जल पर सीधी खड़ी थी। उसके मन: स्थिति को भाप जलपरी ने उससे बोला, हे मुनष्‍य तुम डरो मत मैं जलपरी हूं मैं तुम्‍हारा कुछ भी अहित नहीं करूंगी मैं तो इधर से गुजर रही थी कि तभी तुम्‍हारी बांसुरी की धुन ने मेरा मन मोह लिया और मैं आगे जाने के बजाए नदी की सतह पर आने और तुम्‍हें सुनने को मजबूर हो गयी।

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