слів за хвилину
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Darsh_KEWAT
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सीपीसीटी
इंसान के लिए मनोरंजन बेहद जरूरी है। आधुनिक युग में मानव को मनोरंजन के अनेक साधन प्रदान किए है जैसे रेडियो और फोटो काफी और चित्रकला और खेलकूद आदि। इनमें सबसे अधिक लेाकप्रिय साधन चलचित्र है। चलचित्र का विचित्र इजात आधुनिक समाज के दैनिक उपयोग की जरूरत बन गया है। हमारे सामाजिक जीवन में चलचित्र ने इतना घर कर लिया है कि उसके बिना सामाजिक जीवन कुछ अधूरा सा मालूम पड़ता है। सिनेमा देखना जनता के लिए जीवन में भोजन और पानी कीत रह जरूरी हो गया है। प्रतिदिन शाम को चित्रपट के सामने एकत्रित जनसमुदाय नर नारी को समवाय देखकर चित्रपट की जनप्रियता तथा उपयोगिता का अनुमान लगाया जा सकता है। मनोरंजन सिनेमा का विशेष प्रयोजन है। लेकिन मनोरंजन के अलावा भी जीवन में इसका बहुत योगदान है। इसके अनेक लाभ है। आधुनिक काल में मानव बहुत मशगूल हो गया है। उसकी जरूरत बहुत बढ गयी है। मशगूलता के इस युग में इंसान के पास मनोरंजन का समय नहीं है। यह सभी जानते हैं कि इंसान भोजन के बिना चाहे कुछ समय तक ठीक रह जाये लेकिन मनोरंजन के बिना वह ठीक नहीं रक सकता है। चित्रपट इंसान की इसी अभिलाषा की पूरा करता है। यह मानव जीवन की उदासीनता को दूर कर ताजगी और नयी उमंग भरता है। दिनभर के काम से मशगूल तथा थके हुए नर नारी शाम को सिनेमा हाल में बैठकर खुश हो जाते हैं और दिनभर की थकान को भूल जाते हैं। चित्रपट पर हम सिनेमा हाल में बेठे हिमालय के शिखर तथा हिंसक वन के जीवन आदि व और चीज भी देख सकते हैं जिनको देखने के बारे में हम सोच भी नहीं सकते है। इससे मनोरंजन तो होता ही है साथ ही हमारे मन में बढोतरी भी होती है। इसके लिए अब कहीं जाने की जरुनत नहीं होती है। घर पर ही चित्रपट के जरिये से यह सब कुछ देखा जा सकता है कहीं बाहर जाने की जरूरत नहीं है। और इसमें अनेक प्रकार के समाचार भी सुने जा सकते है। मनोरंजन के अलावा सिनेता से समाज को और भी अनेक लाभ होते है। यह के एक उपयोगी साधन के रूप मिलता है। ऐतिहासिक घटनाओं को चलचित्र पर सजीव देखकर जैसे आसानी से कम समय में जो हो सकता है। वह किताबों को पढने से नहीं हो सकता। अलग अलग प्रदेशों के चित्रपट पर साथ देखकर वहां की कुदरती बनावट एवं जनता का रहन सहन आदि का प्राय हो सकता है जो भूगोल की किताब पढने से कदापि संभव नहीं है। इसी प्रकार और विषयों की दिशा भी चित्रपट के जरिये सरलता से दी जा सकती है। सिनेमा सामाजिक आलोचक के रूप में सेवा करता है। सामाजिक प्रभावों तथा दोषों को जड़ से उखाडने में चित्रपट अहम भूमिका निभाता है। यह समाज की कुप्रभाओं को चित्रपट पर दिखता है और जनता के दिलों में उनके प्रति नफरत का भाव पैदा करता है। हम चित्रपट पर दहेज प्रथा और बाल विवाह और मदिरापान से होने वाले घातक परिणाम को देखते है। तो हमारे मन में उनके प्रति नफरत की भावना पैदा हो जाती हे। इस प्रकार चित्रपट समाज की आलोचना करता है और एक सुधारक का काम भी करता है। हर एक चीज गुण के साथ दोष भी रखती है। सिनेमा में जहां अनेक गुण तथा लाभ देखने को मिलते है। वहीं उसमें हानियां भी कम नहीं होती है।