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SHRAVAN_KUMAR_YADAV
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सरगना की रिहाई मुबंई के 26 नवंबर के आतंकी हमले की बरसी से ठीक पहले जमता-उद-दावा के सरगना हाफिज सईद की रिहाई बेहद दुर्भाग्वपूर्ण और क्षुब्धकारी तो है ही, आतंकवाद पर पाकिस्तान के दोहरेपन का यब ताजा तरीन उदाहरण भी है। यह घटना फिर बताती है है कि आतंकवाद को खाद-पानी देने वाला हमारा पड़ोसी किस तरह दुनिया को आंखों में धूल झोकता है। वैश्विक दबाव मे पंजाब सरकार ने साल की शुरुआत में सईद को आंतकवाद-निरोधक कानून के तहत नजरबंद कर तो दिया था। पर लाजिमी चह ता कि तब वह सईद के खिलाफ चल रहे मामलों की सबूतों की रोशनी में जांच भी करनातींय़ भारत मुंबई हमले को दोबारा जांच करने और हाफिज सईद तथा जकीउर रहमान लखवी के खिलाफ दिए गए सबूतों के आधार पर उनके विरुद्ध मुकदमें फिर से शुरु करने की लगातार मांग करता आया है। लेकिन पाकिस्तान ने न केवल सईद को नजरबंद कर अपनी जिम्मेदारी खत्म मान ली, बल्कि बाद में तो उसे सिर्फ शांति भंग करने के आरोप में कैद रखा गया। चूकि अभियोजन ने जान-बुझकर सईद के खिलाफ कोई सबूत पेश हो नहीं किया, ऐसे में उसकी रिहाई तय थी। यह मानने का कारण है कि सईद की रिहाी में ताकतलर सैन्य प्रतिष्ठान का हाथ है। दरअसल पाकिस्तान में अगले साल चुनाव है और सेना अपनी पिचलग्गू राजनीतिक पार्टियों को चुनाव लजडाने की कोशिश में है, ताकि चुनी हुई सरकार पर उसकी मजबूत पकड़ बनी रहे। चूकि सईद ने पहले ही राजनीतिक पार्टी बनाने की इच्छा जताई थी, ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि पाक सेना क्या एक आतंकी सरगना को राजनीतिक पार्टी बनाने की इच्छा जताई थी, ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि पाक सेना क्या एक आतंकी सरगना को राजनितिक पार्टी बनाने में मदद कर उसे मुख्यधारा में लाने का काम करेगी? एक आकलन यह भी है कि चूकि कश्मीर में ऑपरेशन ऑल आउट और वार्ता की दोहरी रणनीति से पाकिस्तान बौखलाया हुआ है, ऐसे में, वह सईद के जरिये पार्टी में फिर से आंतकवाद को गति देना चाहता है। खुद सईद ने भी रिहाई के बाद इसका संकेत दिया है। भारत के लिए यब बेहद सजग-सतर्क रहने का समय तो है ही, अमेरिका समेत विश्व समुदाय को भी अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञों ने तो ट्रंप से पाकिस्तान को दिया गया गैर नाटो सहयोगी का दर्जा तत्काल रदद करने की मांग की है, आतंकवाद पर पाकिस्तान के इस दोहरेपन का संज्ञान लेते हुए सख्त कदम उठाने चाहिए।