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साँई कम्‍प्‍यूटर टायपिंग इंस्‍टीटयूट गुलाबरा छिन्‍दवाड़ा (म0प्र0) सीपीसीटी न्‍यू बैच प्रांरभ संचालक- लकी श्रीवात्री मो.नं. 9098909565

created Tuesday August 13, 11:43 by Pratima Nivare


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जलवायु परिवर्तन का असर अब पहले से ज्‍यादा मारक होने लगा है, सर्दी, गर्मी और बरसात सभी मौसमों मे यह सैकड़ों लोगों की जान ले रहा है। पूरी दुनिया में  यह आंकड़ा हजारों में है। यह संख्‍या महज मौसम की मार से सीधे प्रभावित होने वालों की है। इससे कई गुना ज्‍यादा संख्‍या बीमारियों और पोषक तत्‍वों की उपलब्‍धा में कमी के कारण होने वाली मौतों की है, जिनकी असली वजह वातावरण का संतुलन बिगड़ जाना है। अजीब विडंवना है की प्राकृतिक संसाधनों के दोहन पर टिका हमारे विकास का ढांचा,दिन-प्रतिदिन तरक्‍की के नए सोपान तो गढ़ रहा है, पर इसके कारण होने वाली दुवीधा का कोई समाधान इसके पास नहीं है। अब जल-भंडारण के पारपंरिक तरीकों और पौराणिक ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया जाए। ये वे तरीके और ज्ञान है जो विकास की चकाचौंध में देश से गुम होते जा रहें है। शायद ही ऐसा कोई शहर हो जो पुराने तालाबों-कुओं पर कब्‍जा किए बगैर विकसित हुआ हो। नदी, तालाब और कुएं सिर्फ उन्‍हीं इलाकों में जीवित बचे हैं जो किन्‍हीं वजहाें से विकास की प्रचालित मान्‍यताओं से अछूते रह गए है। प्रधानमंत्री के आहृान के बाद इसकी उम्‍मीद की जा सकती है कि सरकारें इस दिशा में ज्‍यादा संवेदशीलता दिखाएंगी।
 पांरपरिक ज्ञान में सदियों के अनुभवों का समावेश होता है, इसलिए विपरीत परिस्थितियों में हमेशा हमारे काम आता है। जल-संचयन भी ऐसा ही मामला है। विभिन्‍न तौर-तरीके विकसित हुए है। राजस्‍थान की भौगोलिक स्थिति में तालाब के साथ-साथ नाड़ी, जोहड़ और गांव-घरों में बनाए गए टांके काफी उपयोगी रहे है। हालांकि इनमें ज्‍यादातर अब बदहाल हो चुके है। उसी तरह उत्‍तराखंड जैसे पहाड़ी राज्‍यों में पहाड़ों से निकले पानी को बचाकर रखने का अलग तरीका विकसित हुआ जिसमें पत्‍थर को काटकर पानी के मंदिर बनाए गए।  
 

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