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मंदी पर कविता

created Nov 8th, 10:27 by soni51253


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मैं कवि नहीं हूं, होना भी नही चाहता। कवि होने के हजार लफड़े हैं। मगर फिर भी मैं मंदी पर कविता लिखना चाहता हूं। मंदी पर कविता लिखना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं। यह ठीक वैसा ही है जैसे नेता या राजनीति पर  व्यंग्य लिखना। इन दो विषयों पर आसानी से व्यंग्य लिखा जा सकता है,बल्कि खूब लिखा जा रहा है। आलम यह है कि हर राजनीतिक व्यंग्य लिखने वाला व्यंग्यकार खुद को हरिशंकर परसाई से कमतर नहीं समझ रहा! लेकिन मुझे तो मंदी पर कविता लिखनी है। कविता लिख लूंगा, इसका मुझे यकीन है। मंदी पर कविता लिखने के लिए मुझे शब्दों के उत्खनन की जरूरत नहीं पड़ेगी। जरूरत पड़ेगी बहुत भारी-भरकम भाषा की। एकदम आम भाषा में लिखूंगा, ऐसी भाषा जो ठेले वाले से लेकर रिक्शा वाला तक समझ ले। कविता की थीम कुछ इस तरह की रखूंगा कि सीधा सरकार के दिमाग पर असर छोड़े। सरकार से नेताओं और मंत्रियों तक पहुंचे। एकाध सरकारी ट्विटर हैंड़ल से मेरी कविता री-ट्वीट भी की जाए। अखबारों में जगह पाए। सोशल मीड़िया पर वायरल हो। कविता के इतने प्रचार से फायदा अंततः मुझे ही होगा। हो सकता है। इस बहाने कविता को कोई ऊंचा पुरस्कार ही मिल जाए! ऊंचे कवियों की निगाह में चढ़ जाऊं! मेरा भी शुमार कुछ एक वरिष्ठ कवियों के साथ होने लगे। मैं कोई भी काम सीमित सोच के साथ नहीं करता। मंदी पर कविता एक प्लान के साथ ही लिखुंगा। ऐसा एक मैं ही नहीं, हर लेखक कर रहा है। प्लानिंग का उसूल सिर्फ फैमिली-प्लानिंग तक नहीं चलता, इसे हमें लेखन और साहित्य में भी आजमाना चाहिए। हींग लगे फिटकरी रंग चोखा। मंदी पर कविता लिखने का यह उपयुक्त समय है। हर तरफ बस मंदी ही मंदी का शोर छाया हुआ है। जिसे देखो वह मंदी पर या तो आंसू बहाने पर लगा है या ज्ञान बांटने पर। लुफ्त यह है कि आजकल तो चोर-उचक्का भी मंदी का एक्सपर्ट बना हुआ है। सोशल मीड़िया पर ही इतने तरह के अर्थशास्त्री पैदा हो गए हैं कि उफ्फ..। लगे हाथ मौका देख मैं भी चौका मार ही देता हूं। क्या पता कल को मेरी ‘मंदी पर कविता’ कोर्स में पढ़ाई जाने लगे।  

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