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सॉंई टायपिंग इंस्‍टीट्यूट गुलाबरा छिन्‍दवाड़ा म0प्र0 सीपीसीटी न्‍यू बैच प्रारंभ संचालक:- लकी श्रीवात्री मो0नं. 9098909565

created Dec 3rd, 02:21 by lucky shrivatri


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एक आदमी के दो पुत्र थे राम और श्‍याम। दोनों थे तो सगे भाई पर एक दुसरे के बिलकुल विपरीत, जहा राम बहुत कंजूस था वहीं श्‍याम को फिजूलखर्ची की आदत थी। दोनों की पत्नियां भी उनकी इस आदत से परेशान थी।
 
घरवालों ने दोनों को समझाने के बहुत प्रयास किये पर ना राम अपनी कंजूसी छोड़ता और ना ही श्‍याम अपनी फिजूलखर्ची से बाज आता।
 
एक बार गांव के करीब ही एक सिद्ध महात्‍मा का आगमन हुआ। वृद्ध पिता ने सोचा क्‍यों उन्‍ही से इस समस्‍या का समाधान पूछा जाए और अगले ही दिन वे महात्‍मा जी के पास पहुंचे।
 
महात्‍मा जी ने ध्‍यानपूर्वक उनकी बातें सुनी और अगले दिन दोनों पुत्रों को लेकर आने को कहा।
 
पिताजी तय समय पर पुत्रों को लेकर पहुंच गए।
  
महात्‍मा जी ने पुत्रों के सामने अपनी बंद मुट्ठीयां घुमाते हुए कहा, बताओ यदि मेरा हाथ हमेशा के लिए ऐसा ही हो जाए तो कैसा लगेगा?
 
पुत्र बोले, ऐसे में तो ऐसा लगेगा जैसे कि आपको कोढ़ हो।
 
अच्‍छा अगर हाथ हमेशा के लिए ऐसे हो जाएं तो कैसा लगेगा, महात्‍मा जी ने अपनी फैली हथेलिया दिखाते हुए पुछा।
 
जी, तब भी यही लगेगा कि आपको कोढ़ है, पुत्र बोले।
 
तब महात्‍मा जी गंभीरता से बोले, पुत्रों यही तो मैं तुम्‍हे समझाना चाहता हूं, हमेशा अपनी मुट्ठी बंद रखना यानि कंजूसी दिखाना या हमेशा अपनी हथेली खुली रखना यानि फिजूलखर्ची करना एक तरह का कोढ़ ही तो है। हमेशा मुट्ठी बंद रखने वाला धनवान होते हुए भी निर्धन ही रहता है और हमेशा मुट्ठी खुली रखने वाला चाहे जितना भी धनवान हो उसे निर्धन बनते समय देर नहीं लगता। सही व्‍यवहार है कि कभी मुट्ठी बंद रहे तो कभी खुली तभी जीवन का सुतुलन बना रहता है।
 
पुत्र महात्‍मा जी की बात समझ चुकें थे। अब उन्‍होंने मन ही मन सोच-समझ कर ही खर्च करने का निश्‍चय किया।
 

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