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साँई कम्प्यूटर टायपिंग इंस्टीट्यूट गुलाबरा छिन्दवाड़ा (म0प्र0) संचालक:- लकी श्रीवात्री मो0नां. 9098909565
created Today, 09:03 by rajni shrivatri
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सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक सामग्री से निपटने के तरीकों पर काफी समय से दुनियाभर में माथापच्ची हो रही है, लेकिन कोई ऐसा सर्वमान्य रास्ता नहीं मिल पा रहा है जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे। ऐसी ही सामग्री के खिलाफ सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को अश्लील, आपत्तिजनक और अवैध कंटेंट पर नजर रखने के लिए स्वतंत्र नियामक बनाने की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि जवाबदेही तय होनी चाहिए। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जाॅयमाल्या बागची की पीठ ने यह भी माना कि सोशल मीडिया संस्थानों के स्वनियमन का मॉडल संतोषजनक नहीं है।
सोशल मीडिया कंपनियां अक्सर यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से बचने का रास्ता खोज लेती हैं कि वह कंटेंट जनरेट नहीं करती बल्कि सिर्फ मंच उपलब्ध कराती है। यह सच है, लेकिन हकीकत यह भी है कि विवादित कंटेंट को प्रमोट करने में अपने एल्गोरिदम का इस्तेमाल कर मुनाफा कमाने की होड़ में ये कंपनियां पूरी ताकत लगा रही है। विवाद की स्थिति में सरकार का आइटी मंत्रालय जरूर पोस्ट हटाने का निर्देश देता है, लेकिन इस पर अक्सर राजनीति प्रेरित होने के आरोप भी लगते है। सोशल मीडिया को जिम्मेदार बनाने की माथापच्ची सिर्फ भारत में ही नहीं है। भारत से पहले इस समस्या से जूूझते देशों ने कुछ पहल की है, जिनके अनुभवों से हमें फायदा हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का स्वतंत्र नियामक बनाने का सुझाव काबिले गौर है। लेकिन क्या कोई स्वतंत्र नियामक आपत्तिजनक सामग्री को वायरल होने से पहले रोक सकता है? सुप्रीम कोर्ट के पूर्वावलोकन का विकल्प भी दिया है। यदि ऐसा संभव हैं तो उसका क्या मैकेनिज्म हो सकता है, यह अगला विचारणीय प्रश्न है। पूर्वावलोकन की व्यवस्था का क्या दुरूपयोग नहीं होगा। जो अक्सर विवादों में रहती है।
सोशल मीडिया कंपनियां अक्सर यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से बचने का रास्ता खोज लेती हैं कि वह कंटेंट जनरेट नहीं करती बल्कि सिर्फ मंच उपलब्ध कराती है। यह सच है, लेकिन हकीकत यह भी है कि विवादित कंटेंट को प्रमोट करने में अपने एल्गोरिदम का इस्तेमाल कर मुनाफा कमाने की होड़ में ये कंपनियां पूरी ताकत लगा रही है। विवाद की स्थिति में सरकार का आइटी मंत्रालय जरूर पोस्ट हटाने का निर्देश देता है, लेकिन इस पर अक्सर राजनीति प्रेरित होने के आरोप भी लगते है। सोशल मीडिया को जिम्मेदार बनाने की माथापच्ची सिर्फ भारत में ही नहीं है। भारत से पहले इस समस्या से जूूझते देशों ने कुछ पहल की है, जिनके अनुभवों से हमें फायदा हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का स्वतंत्र नियामक बनाने का सुझाव काबिले गौर है। लेकिन क्या कोई स्वतंत्र नियामक आपत्तिजनक सामग्री को वायरल होने से पहले रोक सकता है? सुप्रीम कोर्ट के पूर्वावलोकन का विकल्प भी दिया है। यदि ऐसा संभव हैं तो उसका क्या मैकेनिज्म हो सकता है, यह अगला विचारणीय प्रश्न है। पूर्वावलोकन की व्यवस्था का क्या दुरूपयोग नहीं होगा। जो अक्सर विवादों में रहती है।
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