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साँई कम्‍प्‍यूटर टायपिंग इंस्‍टीट्यूट गुलाबरा छिन्‍दवाड़ा (म0प्र0) संचालक:- लकी श्रीवात्री मो0नां. 9098909565

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एक दिन की बात है। राजदरबार लगा हुआ था। तभी एक भिक्षु विक्रमादित्‍य के दरबार में आता है और एक फल राजा को देकर चला जाता हैं। राजा उस फल को कोषाध्‍यक्ष को दे देता हैं। उस दिन के बाद से हर रोज वह भिक्षु राजा के दरबार में आने लगा। उसका रोज का काम यही था कि वह राजा को फल देता और चुपचाप चला जाता। राजा भी प्रत्‍येक दिन भिक्षु द्वारा दिया गया फल कोषाध्‍यक्ष को थमा देता। ऐसे करते-करते करीब 10 साल बीत गए। एक दिन जब भिक्षु फिर राजा के दरबार में आकर फल देता हैं, तो इस बार राजा फल कोषाध्‍यक्ष को देकर वहां मौजूद एक पालतू बंदर के बच्‍चे को दे देते हैं। यह बंदर किसी सुरक्षाकर्मी का था, जो छूट कर अचानक राजा के पास जाता हैं। बंदर जब उस फल कों खाने के लिए तोड़ता है, तो उस फल के बीच से एक बहुमूल्‍य रत्‍न निकलता है। उस रत्‍न की चमक को देख राज दरबार में मौजूद सभी लोग हैरत में पड़ जाते हैं। राजा भी यह नजारा देख आश्‍चर्य में पड़ जाता हैं। राजा कोषाध्‍यक्ष को इससे पूर्व भिक्षु द्वारा दिए गए सभी फलों के बारे में पूछता हैं। राजा के पूछने पर कोषाध्‍यक्ष बताता हैं कि महाराज मैंने उन सभी फलों को रोज कोष में सुरक्षित रखवा दिया हैं। मैं उन सभी फलों को अभी लेकर आता हूं। कुछ देर बाद कोषाध्‍यक्ष राजा के आकर बताता है कि सभी फल सड़-गल गए हैं। उनके स्‍थान पर बहुमूल्‍य रत्‍न बचे हुंए हैं। यह सुनकर राजा बहुत खुश होता हैं और कोषाध्‍यक्ष  को सारे रत्‍न सौंप देता हैं। अगली बार जब भिक्षु फल लेकर दोबारा विक्रमादित्‍य के दरबार पहुंचता है, तो राजा कहते हैं, भिक्षु मैं आपका फल तब तक ग्रहण नहीं करूंगा, जब तक आप यह नहीं बताते कि हर दिन आप इतनी बहुमूल्‍य भेंट मुझे क्‍यों अर्पित करते हैं? राजा की यह बात सुन  भिक्षु उन्‍हें एकांत स्‍थान पर चलने को कहता है। एकांत में ले जाकर भिक्षु राजा को बताता है कि मुझे मंत्र साधना करनी हैं। और उस साधना के लिए मुझे एक वीर पुरुष की जरूरत है। चूंकि, मुझे तुमसे  वीर दूसरा कोई नहीं मिल सकता, इसलिए यह बहुमूल्‍य उपहार तुम्‍हें दे जाता हूं। भिक्षु की बात सुन राजा विक्रमादित्‍य उसकी सहायता करने का वचन देते हैं। तब‍ भिक्षु राजा को बताता है कि अगली अमावस्‍या की रात को पास के श्‍मशान आना होगा, जहां वह मंत्र साधना की तैयारी करेगा। इतना कहकर भिक्षु वहां से चला जाता हैं। अमावस्‍या का दिन आते ही राजा को भिक्षु की बात याद आती है और वह वचन के अनुसार श्‍मशान पहुंच जाते हैं। राजा को देख भिक्षु बहुत प्रसन्‍न होता हैं। भिक्षु कहता हैं, हे राजन तुम यहां आए मैं बहुत खुश हुआ कि तुम्‍हें तुम्‍हारा वचन याद रहा। अब यहां से पूर्व की दिशा में जाओ। वहां एक महाश्‍मशान मिलेगा। उस महाश्‍माशन में एक शीशम का एक विशाल वृक्ष है। उस वृक्ष पर एक मुर्दा लटका हुआ है। उस मुर्दे को तुम्‍हें मेरे पास लेकर आना है। भिक्षु की बात सुनकर राजा सीधे उस मुर्दे को लाने चल देता है। महाश्‍मशान में पहुंचने के बाद राजा को एक विशाल शीशम के पेड़ पर एक मुर्दा लटका हुआ दिखाई  देता हैं। राजा अपनी तलवार खींचता है और पेड़ से बंधी डोर को काट देता हैं।  

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