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TRIVENI TYPING MANSAROVAR COMPLEX CHHINDWARA MOB-7089973746

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शहीद भगत सिंह से लेकर आज तक दुनिया में कहीं भी इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगता है, तो हसरत मोहानी याद आते हैं। वह खुद ही लिखे गए हैं, आती तो याद उनकी महीनों तक नहीं आती मगर जब याद आते हैं तो अक्सर याद आते हैं हिंदी के दो लेखक गुजर गए- एक, विनोद कुमार शुक्ल और दूसरे, ज्ञानरंजन। दैनिकों ने खबरें संपादकीय लिखे और विशेष पेज भी निकाले। सोशल मीडिया शोक संदेशों से भरा रहा- इनके जाने से साहित्य की दुनिया कुछ और सूनी हो गई उनकी कमी हमेशा खलेगी छोड़ गए हैं, कभी भरने वाला नहीं। कुछ दुखी मन मेरे गाते दिखे कुछ ऊपर से दुखी अंदर से सुखी दिखे। कुछ अंग्रेजी दैनिकों ने अपना हिंदी-प्रेम दिखाकर हिंदी वालों को अपना मुरीद बनाया। दोनों लेखकों पर टिप्पणियां छापीं, दोनों को लगभग ठीक-ठीक प्लेस कर उनके साहित्यिक अवदान को याद किया। कुछ शुक्ल के उपन्यास नौकर की कमीज, दीवार में एक खिड़की रहती थी और खिलेगा तो देखेंगे की भाषा लीला पर कुर्बान दिखे, तो कुछ ने ज्ञान की कहानियां जैसे फेंस के इधर उधर, घंटा, बहिर्गमन या पिता आदि को अकहानी का ट्रेंड सेटर मान, उनके खुरदरेपन ठेठपन के लिए याद किया। इस अवसर पर भी हिंदी वालों का दुख जितना बोला, सगुण भाव से बोला। शोक में भी मेरे-तेरे लगी रही, जबकि अंग्रेजी में बहुत दूर तक तटस्थ भाव दिखा। सोशल मीडिया पर बात-बेबात रिएक्ट करने वाले रिएक्ट तो किए, पर हिसाब-किताब के साथ कि उसने मेरे लिए क्या कभी कुछ कहा, जो मैं उसके लिए कहूं? जो आजीवन दुश्मन रहा, उसे मैं लिफ्ट क्यों दूं? हिंदी में सब अपने-अपने बही-खातों में रहते हैं और हर वक्त जोड़-घटाव करते रहते हैं- कब, किसने मेरे लिए क्या किया? किसने कहां टांच मारी? कब, किसने रोड़े अटकाए? वह मेरे साथ है या मेरे दुश्मन के साथ?

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