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साँई कम्‍प्‍यूटर टायपिंग इंस्‍टीट्यूट गुलाबरा छिन्‍दवाड़ा म0प्र0 संचालक:- लकी श्रीवात्री मो0नां. 9098909565

created Today, 05:57 by lucky shrivatri


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बच्‍चे स्‍कूल में क्‍या करने जाते है? इस सवाल का जवाब पढ़ाई के अलावा शायद ही कोई दूसरा होगा। स्‍कूल-कॉलेज चाहे सरकारी क्षेत्र के हो या फिर निजी क्षेत्र के, वहा जाने का मकसद शिक्षा ग्रहण का होता है। जिन अभिभावकों को बच्‍चों के लिए अतिरिक्‍त सुविधाएं चाहिए, वे निजी स्‍कूलाें का चयन करते है क्‍योंकि सरकारी स्‍कूल आम तौर पर इन मामलों में काफी पीछे होते है। फीस से जुड़े एक प्रकरण में दिल्‍ली हाईकोर्ट ने एक निजी स्‍कूल में अभिभावकों से लिए जाने वाले वातानुकूलन शुल्‍क की वसूली रोकने से जुड़ी जन हित याचिका को खारिज कर दिया।  
कोर्ट का कहना था कि स्‍कूल का चयन करते समय अभिभावकों को इस बात का भी ध्‍यान रखना होगा कि उनके बच्‍चों को कौनसी सुविधाएं दी जा रही है और लागत क्‍या है? कोर्ट ने साफ कहा है कि सुविधाएं प्रदान करने का वित्तीय बोझ अकेले स्‍कूल पर नहीं डाला जा सकता। निजी क्षेत्र के प्रबंधन वाले स्‍कूल-कॉलेज से लेर अस्‍पतालों और एयरपोर्ट तक में कई मदों में शुल्‍क वसूला जाता  है। निश्चित रूप से ऐसे शुल्‍क कई बार मनमाने तरीके से भी वसूल किए जाते है। जहां तक निजी स्‍कूलों का सवाल है, अतिरिक्‍त सुविधाओं को देखते हुए ही अभिभावक इनका चयन करते है। हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते समय यह तर्क दिया है कि वातानुकूल सुविधा के लिए पहले ही स्‍कूल ने अपने फीस चार्ट में अलग शुल्‍क का उल्‍लेख कर रखा है। ऐसे अभिभावकों से स्‍कूल में वातानुकूलन सेवाओं की लागत वसूलनी होगी। मंहगी शिक्षा हो या चिकित्‍सा, निश्चित ही आम आदमी की पहुंच से दूर होती है। सुविधाएं किसी भी स्‍तर की हो, उन्‍हें पाने के लिए अतिरिक्‍त वसूली स्‍वाभाविक है, बशर्ते वह तर्कसंगत हो। दिल्‍ली हाईकोर्ट ने भी यह कहते हुए याचिका को खारिज किया था।     

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